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13 नवंबर 24 बुधवार
सुबह आठ बजे होटल के नीचे एक छोटे हाल में साहित्य संगम का कार्यक्रम शुरु हो गया। मैं साढे आठ पर तैयार होकर नीचे पंहुचा। रीता जी पूर्वोत्तर हिन्दी साहित्य अकादमी नामक संस्था असम के तेजपुर में चलाती है। सारी योजना उन्ही की थी। चितवन के एक डेढ दर्जन साहित्यकार इस कार्यक्रम में मौजूद थे। स्वागत सत्कार के बाद भारत से गए हम छ: लोगों में से मुझे छोडकर सभी ने अपनी रचनाएं सुनाई। इसके बाद नेपाली साहित्यकारों ने अपनी रचनाएं सुनाई। करीब दो घण्टे यह आयोजन चला। नेपाल के कई साहित्यकार हिन्दी में भी लिखते हैं। हमें भी कई पुस्तकें और प्रमाणपत्र भेंट किए गए।
कार्यक्रम के बाद अल्पाहार किया,मैने तो मटर की सब्जी और रोटी का भोजन ही कर लिया।
आज हमें चितवन घूम कर शाम तक पोखरा पंहुचना है। चितवन में चितवन नेशनल पार्क है,जहां शेर,चीते गैण्डे जैसे वन्यप्राणी विद्यमान है। मैने सुझाव दिया कि नेशनल पार्क में जाने का कोई मतलब नहीं है,क्योकि दोपहर हो चुकी है और दोपहर को वन्य प्राणी विचरण नहीं करते। लेकिन फिर भी उषा तिवारी जी हमें लेकर पहले चितवन नेशनल पार्क के मुख्यद्वार पर लेकर गई। यहां कुछ फोटो विडीयो बनाकर हम लोग बीस हजारी ताल के गेट पर पंहुचे। यहां पर्यटकों की सुविधा के लिए एक-दो शेरों को पिंजरों में रखा गया है,ताकि पर्यटक शेरों का दीदार कर सके।
हम वहां पंहुचे। शेर को देखने के लिए टावर बनाया गया है। टावर के सामने शेर को रखने का स्थान बनाया गया है। वाच टावर पर चढकर हमने शेरों का दीदार किया। विडीयो बनाए। यहां पर सफेद शेर भी मौजूद था,जो कि दुर्लभ श्रेणी का प्राणी है।
अब यहां से आगे बढे। यहां दो नदियों त्रिशूरी और गण्डकी का संगम है,जिसे देवघाट कहा जाता है। इसे आदि प्रयाग भी कहते है। देवघाट पोखरा के रास्ते में ही पडता है। देवघाट को देखते हुए हम पोखरा के लिए बढ गए। पोखरा की दूरी मात्र 130 किमी थी। लेकिन बताया गया था कि सडक़ खराब है और काफी समय लग सकता है। देवघाट से आगे बढे,तो शुरुआत में सडक़ बढिया थी। तेज गति से गाडी चली। हम करीब ढाई बजे चितवन से पोखरा के लिए निकल गए थे।
रास्ता कहीं बेहद अच्छा था,तो कहीं बेहद खराब। कहीं चौडीकरण का काम चल रहा था। चितवन से पोखरा वाला यह रास्ता पृथ्वी राजमार्ग था।
गूगल मैप लगातार दिखा रहा था कि हम साढे सात तक पोखरा पंहुचेंगे। जब पोखरा के नजदीक पंहुचे तो सडक़ और खराब हो गई। मुझे लगा था कि हम थोडा पहले पंहुच जाएंगे,लेकिन खराब रास्ते की वजह से आखिरकार पौने आठ बजे हम पोखरा में अपने होटल सी लैक पर पर पंहुचे।
आज चूंकि समय पर आ गए थे,तुमुल सिन्हा जी और मुझे एक ही कमरे में रहना था,इसलिए हमने शाम बहुत अच्छे से गुजारी। शाम को हमें बताया गया कि यहा का सनराइज बडा खुबसूरत होता है,लेकिन उसके लिए सुबह पांच बजे निकलना पडेगा। मैने साफ इंकार कर दिया। मुझे अपनी नींद खराब करके सूर्योदय नहीं देखना था। लेकिन रात के चर्चासत्र में सिन्हा जी ने मुझे चढा दिया। उन्होने कहा चलना ही पडेगा। मैने भी सोचा कि अगर एकाध घण्टे की बात है तो सुबह बिना फ्रैश हुए चले जाएंगे और लौट कर आएंगे तो सुबह के सारे कार्यक्रम निपटा लेंगे। सिन्हा जी के दबाव में मैने हां कह दिया।
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