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15 नवंबर-
पोखरा का दूसरा दिन। आज हमें विन्ध्य वासिनी देवी के दर्शन करके काठमाण्डू पंहुचना था। सुबह जल्दी उठकर निकलने की योजना थी। करीब नौ बजे होटल से निकले। विन्ध्य वासिनी पोखरा का प्रसिध्द धर्मस्थल है। एक विन्ध्य वासिनी हमारे मध्यप्रदेश में मैहर माता के रुप में मौजूद है,दूसरी यहां है।
विन्ध्यवासिनी देवी के दर्शन किए । यहां विडीयो भी बनाए। यहां एक टावर बनाकर व्यू पाइन्ट बनाया गया है,जहां से नेपाल की कई प्रसिध्द पर्वत चोटियां नजर आती है। मौसम साफ था इसलिए हमें भी यहां से माछा पूच्छा चोटी नजर आ गई थी। माछा पूच्छा यानी मछली की पूछ जैसी। यह चोटी इसी आकार की है।
हमारे साथ चितवन से आई ऊषा तिवारी जी को यहीं से वापस लौटना था। देवी दर्शन के बाद यहां से निकले। ऊषा जी मोंगलिंग तक हमारे साथ ही जाने वाली थी। सुबह देवी दर्शन के बाद उनके रिश्तेदार के होटल में ही नाश्ता भोजन किया था और पोखरा से रवाना हो गए थे।
गाडी के सभी यात्री साहसी यात्री थे। इनोवा में हम कुल नौ लोग फंसे हुए थे। यात्रा आयोजन रीता सिंह जी,उनकी बहिन पूजा और सहेली ऊषा तिवारी। अरुणाचल से आई गुम्फी जी और उनका बेटा लिदिन। तुमुल जी,वैदेही और ड्राइवर प्रदीप पाल। नेपाल के जर्जर पहाडी रास्तों पर इस तरह से फंस फंसा कर साहसी लोग ही यात्रा कर सकते हैं।
पोखरा से बढे। दोपहर करीब दो बजे मोंगलिंग पंहुचे। जहां सभी ने दोपहर का भोजन किया,मेरे अलावा। नेपाल के टूटे फूटे महेन्द्र राजमार्ग पर चलते हुए हम शाम करीब छ: बजे काठमाण्डू के हमारे होटल रामेश्वरम पंहुच गए। नेपाल में अंधेरा साढे पांच बजे ही हो जाता है। होटल के कमरे में पंहुचे। अभी कहीं आने जाने का इरादा नहीं था। पशुपतिनाथ के दर्शन करने के लिए सुबह छ: बजे नहा धोकर जाना था। मन्दिर होटल के सामने ही सडक़ के दूसरी तरफ था।
रात्रिकालीन चर्चा के बाद इस दिन का समापन हुआ।
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