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16 नवंबर 2024
विश्व विख्यात पशुपतिनाथ मन्दिर होटल के बिलकुल सामने ही था। सुबह सवेरे जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर मन्दिर के दर्शनों के लिए चले।
अद्भुत और विशाल मन्दिर। लेकिन मन्दिर में उतनी भीड नहीं थी,जितनी आशंका थी। दर्शनार्थी थे तो बडी संख्या में,दर्शनों के लिए कतार भी लगी हुई थी,लेकिन दर्शन करने में अधिक समय नहीं लगा।
मन्दिर के पीछे ही गण्डकी नदी बहती है। यहीं एक स्थान पर श्मशान भी है,जहां मृतकों की अंतिम क्रिया चल रही थी। मन्दिर में कई स्थानों पर हवन पूजन,मंत्रोच्चार और भजन कीर्तन चल रहे थे। काफी देर इन चीजों का आनन्द लेने के बाद यहां से निकले।
काठमाण्डू से करीब तीस किमी दूर एक कस्बे में स्थानीय साहित्यकारों ने भारतीय साहित्यकारों के आगमन के उपलक्ष्य में मिलन समारोह आयोजित किया था। हमें वहां पंहुचना था। वहां पंहुचकर साहित्यिक आयोजन में शामिल हुए।
आयोजन में जहां नेपाली साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया,वहीं भारत से गए हुए साहित्यकारों ने भी अपनी कृतियों का पाठ किया। लेखकों ने एक दूसरे को अपनी प्रकाशित पुस्तकें भेंट की. करीब दो घण्टे के आयोजन के बाद वहां से लौटे।
शाम को काठमाण्डू में ही हमारे यात्रा आयोजकों के एक और मित्र समूह के साथ सांध्यकालीन भोजन और साहित्य चर्चा का कार्यक्रम था। कथित रुप से एक प्रसिध्द थकाली रेस्टोरेन्ट में आयोजित इस कार्यक्रम में हमारे सभी सहयात्रियों ने भोजन का आनन्द लिया और होटल लौटे।
नेपाल यात्रा अब अपने समापन की ओर थी। अगली सुबह हमें काठमाण्डू से भारत के लिए यानी काकरभिट्टा बार्डर के लिए रवाना होना है।
17 नवंबर
काठमाण्डू से सुबह जल्दी निकलने का इरादा था,लेकिन हमारी यात्रा आयोजक रीता सिंह जी सुबह एक बार और पशुपतिनाथ महादेव के दर्शन करना चाहती थी। वैदेही भी उनके साथ जल्दी उठकर दर्शन के लिए पंहुच गई थी।
इस दौरान मैं तैयार हुआ और अब सभी लोग काठमाण्डू से वापसी के लिए तैयार थे। काठमाण्डू से काकरभिट्टा बार्डर करीब साढे चार सौ किमी दूर है। गुगल मैप के मुताबिक इतनी दूरी पार करने के लिए यदि बिना रुके भी चले तो साढे ग्यारह घण्टे लगने थे,जबकि हम लोगों को रास्ते में भोजन नाश्ता इत्यादि भी करना था।
खैर अब वापसी का सफर शुरु हुआ। नेपाल के उबड खाबड रास्तो पर चलते हुए हमारा सफर आधी रात तक चलता रहा। रात करीब एक बजे हमारी गाडी काकरभिट्टा बार्डर पर पंहुची।
वहां पंहुचकर याद आया कि भारत नेपाल बार्डर पर सूर्यास्त के बाद आवागमन बन्द हो जाता है। बार्डर के गेट बन्द हो चुके थे और अब सुबह तक बार्डर पार नहीं की जा सकती थी। हमारी महिला यात्रियों ने वहां तैनात नेपाली सुरक्षाकर्मियों से काफी अनुनय विनय की,लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। महिलाओं ने नेपाली भाषा में उन्हे समझाने की कोशिश की,कि गाडी में अधिकांश महिलाएं है,रात भर वे क्या करेंगी? उनका टका सा जवाब था कि गाडी में ही रात काटो या आस पास के किसी होटल में चले जाओ।
मजेदार बात यह है कि रीता सिंह जी ने सिलीगुडी में वहीं होटल फिर से बुक करके रखा था,जहां पहली रात हम रुके थे। लेकिन अब हम उस होटल पर तो जा ही नहीं सकते थे। इस वक्त रात के करीब डेढ बज चुके थे और अब पूरी रात काटने की चुनौती थी। इसी बीच रीता जी को अचानक काकरभिट्टा के एक होटल व्यवसायी का ख्याल आया। उसका नम्बर भी उनके पास मौजूद था। उस होटल में पंहुचे और होटल व्यवसायी को फोन लगाया। किस्मत अच्छी थी कि रात डेढ बजे उसने फोन भी उठा लिया और कमरे भी देने को राजी हो गया।
कमरों में पंहुचे तब तक दो बज चुके थे और सुबद छ: बजे यहां से निकलना था,क्योकि अरुणाचल से आई गुम्फी जी की फ्लाइट सिलीगुडी से सुबह नौ बजे थी। उन्हे सही समय पर एयर पोर्ट पर पंहुचाना था।
18 नवंबर
सुबह छ: बजे काकरभिट्टा से निकले और सीधे सिलीगुडी एयरपोर्ट पर पंहुचे। गुम्फी जी को सही समय पर एयरपोर्ट पर छोड दिया गया। हमारी ट्रेन न्यू जलपाई गुडी से रात आट बजे थी और रिजर्वेशन कन्फर्म हो चुका था,इसलिए कोई तनाव नहीं था।
सिलीगुडी में एक होटल में दो रुम लिए। अब हम सिर्फ पांच लोग बचे थे। मै और वैदेही,तुमुल जी,रीता जी और उनकी बहन। तीनों महिलाएं सिलीगुडी बाजार में खरीददारी करना चाहती थी और कुछ परिचितों से भी मिलना चाहती थी। इसलिए होटल में स्नान इत्यादि से निवृत्त होकर तीनों महिलाएं वहां से रवाना हो गई। अब बचे हम दो मैं और तुमुल सिन्हा जी। हमने अपना वक्त चर्चाओं में गुजारा। कुछ आराम किया। तुमुल जी की ट्रेन अगली सुबह थी।
शाम को तुमुल जी हमे स्टेशन पर छोडने आए और ट्रेन सही समय पर न्यू जलपाईगुडी पंहुच गई। हम ट्रेन में सवार हुए और एक लम्बा सफर काट कर सीधे रतलाम पंहुच गए।
समाप्त।
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