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14 जून रविवार (सुबह 7.00)
आरामपुर फारेस्ट रेस्ट हाउस,धरियावाड रेंज (सीता माता अभयारण्य)
सुबह हो चुकी है। इस वन विश्रान्ति गृह के बाहर चारो ओर वैसे तो शांति है,लेकिन जंगल अपनी भाषा बोल रहा है। चिडियों की चहचहाट हैं,तो दूर कहीं किसी अन्य परिन्दे की बोली सुनाई दे रही है। अलग अलग तरह की ध्वनियां आ रही है,जिन्हे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता,सिर्फ सुना और महसूस किया जा सकता है। ठण्डी हवा बह रही है। बंदर पेडों पर कूद फान्द रहे हैं। एक काला कुत्ता इधर उधर डोल रहा है। अभी उसे पास बुलाकर मैने उससे परिचय किया है।
हम सीता माता अभयारण्य की धरियावाड रेंज में,जंगल के बीचो बीच स्थित आरामपुर वन विश्रान्ति गृह में रुके है। कल दोपहर करीब तीन बजे हम यहां पंहुचते ही हम,तुरंत सीता माता अभयारण्य के खास दर्शनीय स्थल देखने निकल पडे थ।े
इस एफआरएच से करीब 5 किमी आगे बानसी गांव है और वहां से करीब 15 मिकी आगे डमडमा गेट। बानसी में पूछताछ करके डमडमा गेट की ओर बढ गए। यहीं से सीता माता अभयारण्य की सदडी रेंज प्रारंभ होती है। यहीं सर्वाधिक दर्शनीय है। डमडमा गेट से प्रवेश के लिए प्रति व्यक्ति 165 रु. और वाहन के 370 रु.देकर हमने इसमे प्रवेश किया।
गेट से सात किमी की दूरी पर सीता माता का एकमात्र मन्दिर है। यही इस रेंज का अंतिम पाइन्ट है। 6.50 किमी तक वाहन जाता है,लेकिन पूरा कच्चा और खतरनाक रास्ता। धूल भरे तीखे ढलान और खडी चढाईयां। 6.50 किमी की दूरी तय करने में कार को करीब 40 मिनट लग गए।
आखरी पाइंट पर पंहुचे,तो वहां हनुमान मन्दिर था। वहां जाकर पता चला कि लव कुश ने हनुमान जी को युध्द में हरा कर एक पेड से बान्ध दिया था। वह पेड यहीं है। पेड के चारो ओर चबूतरा बना है। हनुमान जी का चित्र भी बना हुआ है। इस स्थान से आधा किमी पैदल जाना पडता है। पहाडी रास्ता। चढाई और ढलान वाला। एक ओर नदी बह रही है। दोनो ओर पहाडियां खडी है। जैसे पहाडों के बीच दरार बनी हो या पहाड को बीच में से चीर दिया गया हो। इसी के बीच से रास्ता बना है। आधा किमी चलने पर दोनो ओर की पहाडियां मिल जाती है।सामने पहाडी पर जाने के लिए सीढियां बनी है। जो नदी साथ आ रही थी,वह मन्दिर के नीचे की ओर एक कुण्ड में आकर रुक जाती है। यह सीता कुण्ड है। सीढियां चढकर उपर जाने पर सीता माता का मन्दिर है,जिसमें सीता माता की छोटी सी आकर्षक प्रतिमा है। कहते है कि यह सीता माता का एकमात्र मन्दिर है वरना सीता मैया जहां भी होती है,रामजी के साथ ही होती है।
सीता माता का मन्दिर यहां क्यों है?कहते हैं कि यही वह स्थान है,जहां सीता मैया जमीन में समा गई थी। जब हनुमान जी को लव कुश ने बान्ध लिया,तब प्रभु श्री राम युध्द करने आए। पिता पुत्र के युद्द होने की खबर मिलने पर सीता मैया वहां पंहुची और राम जी का परिचय उनके पुत्रों से करवाया। प्रभु राम ने उन्हे अयोध्या चलने को कहा,लेकिन भूमि पुत्री सीता ने अपनी माता पृथ्वी से प्रार्थना की कि वह उन्हे अपने में समा लें। माता सीता की प्रार्थना पर पहाड फटा और उसमे से पृथ्वी माता बाहर आई। वे अपनी पुत्री सीता को लेकर इसी कुण्ड से लौट गई। नीचे वही सीता कुण्ड है।
यह पूरा इलाका सीता मैया के वनवास की कथा से जुडा है। सबसे आखिर में सीता माता का मन्दिर है। वहां से वापसी में लवकुश के झरने और वाल्मिकी आश्रम भी देखने को मिला। कथा यह है कि जब प्रभु श्री राम ने माता सीता का त्याग किया तो वे यहीं आई थी। यहां वाल्मिकी जी के आश्रम में उन्होने लव कुश को जन्म दिया।लव कुश यहीं खेलते थे। इस स्थान पर मात्र सौ डेढ सौ मीटर की दूरी पर दो जलधाराएं बहती है,जिनमें से एक गर्म पानी की धारा है और दूसरी ठण्डे पानी की। इसके नजदीक बीस बीघा बरगद है,जो वास्तव में बीस बीघा क्षेत्र मे फैला है। कहते है ,लव कुश यहां खेला करते थे।
कुल मिलाकर यह पूरा घना जंगल सीता माता के वनवास की कथा से जुडा है। गाडी से इन इलाकों को देखकर वापस डमडमा गेट तक आने में हमें करीब साढे तीन घण्टे लगे। जंगल का कमाल ये था कि इस घनघोर गर्मी के मौसम में जब सारे नदी नाले तालाब सूख चुके है,यहां की नदियों में भरपूर पानी है और बडी संख्या में पर्यटक इन नदियों के झरनों में जलक्रीडा का आनन्द ले रहे थे। घने जंगल में गर्मी का असर भी बेहद कम था।
हमें करीब सात बजे तक अपने रेस्ट हाउस में लौटना था,क्योकि हमें बताया गया था कि उडन गिलहरियां शाम को अंधेरा ढलने के वक्त ही बाहर निकलती है। इस जंगल की सबसे बडी खासियत उडन गिलहरियां ही हैं,जो कि भारत में यहां के अलावा सिर्फ नार्थ इस्ट के जंगलों में दिखाई देती है। इसके अलावा कुछ अन्य देशों म्यानमार,कंबोडिया जैसे देशों में ये दिखाई देती है।
उडन गिलहरियों को देखने की उत्सुकता में हम झटपट रेस्ट हाउस पर लौटे। उडन गिलहरियों के दिखाई देने की सर्वाधिक संभावना रेस्ट हाउस के बाहर वाले पेडों पर ही होती है।
सांझ का झुटपुटा हुआ,धीरे धीरे अंधेरा घिरने लगा और कुछ ही देर में छा गया। हम रेस्ट हाउस से बाहर निकल कर बाई ओर के दो तीन पेडों पर नजरें जमाए बैठे थे। यहां के फारेस्ट गार्ड शक्तिशाली टार्च की रोशनी में उन्हे देखने की कोशिश कर रहे थे।आखिरकार एक गिलहरी नजर आई,लेकिन वह अपने खान पान में ही व्यस्त थी। खापी देर तक उसे देखते रहे,लेकिन वह वहीं बेठी रही,वहां से हिलने तक को राजी नहीं हुई। हम उसे उडते हुए नहीं देख पाए। करीब आधे पौने घण्टे की मशक्कत के बाद रेस्ट हाउस के भीतर आ गए।
यहां के रसोईए अजमल को भोजन बनाने को पहले ही कह दिया था। उसने भिण्डी की सब्जी,दाल चावल और रोटी बनाई थी। मेरे अलावा तीनो यानी वैदेही,मलय और ध्रुपद ने भोजन किया। और रात बरह बजते बजते मुझे डायरी लिखने के बाद नींद आ गई।
सुबह 6.30 पर नींद खुल गई। आज हम जाखम डेम देखते हुए वापसी करेंगे। रास्ते में अरनोद में गौतमेश्वर के दर्शन भी करते हुए जाएंगे।
ये सीता माता वन्य जीव अभयारण्य करीब 425 वर्ग किमी में फैला हुआ है। यह तीन रैंज में बंटा हुआ है। पहली धरियावाद रेंज,जिसमें हम मौजूद है। दूसरी सादडी रैंज जिसमें हम कल घूम कर आए थे और तीसरी जाखम रैंज,यहां हम आज जाएंगे। इस जंगल में आना बडा आसान है। रतलाम से आप चलो तो सैलाना,पिपलौदा,दलोठ,अरनोद,प्रतापगढ और वहां से धरियावाद होते हुए जंगल में आ जाईए। आप चाहो तो मन्दसौर और नीमच होते हुए भी आप यहां आ सकते है। रतलाम से करीब एक सौ अस्सी किमी की दूरी है। चाहे तो केवल एक दिन में भी यहां का भ्रमण किया जा सकता है।
15 जून सोमवार
इ खबरटुडे आफिस,रतलाम।
कल हम दोपहल करीब साढे तीन बजे रतलाम लौट आए थे। रतलाम लौटने के बाद डायरी लिखने का समय ही नहीं मिल पाया,इसलिए यात्रा वृत्तान्त का समापन आज लिख पा रहा हूं।
रविवार को यानी कल,आरामपुर रेस्ट हाउस पर करीब साढे नौ बजे तक स्नान आदि से निवृत्त हुए। रसोईए को सुबह के नाश्ते के लिए रात को ही बता दिया था। उसने आलू के पराठे बनाए थे। चूल्हे पर बने आलू के पराठों में मसाला बेहद कम था फिर भी स्वाद अच्छा था। दो दो पराठों में पूरे दिन भर को काम हो गया।
रेस्ट हाउस में प्रति कमरा सात सौ रु. और भोजन के लिए ग्यारह सौ रु.इस तरह करीब तेईस सौ रुपए चुका कर हम करीब सवा दस बजे यहां से निकल गए। धरियावाद में रुक कर चाय पी। धरियावाद से प्रतापगढ के रास्ते पर आगे बढने पर एक जगह दो रास्ते कटते है। एक सीधा प्रतापगढ जाता है,और दूसरा रास्ता जाखम डैम की ओर जाता है। इस दोराहे से जाखम जैम बीस किमी दूर है। दस किमी तक तो शानदार सडक़ है,लेकिन उसके बाद सडक़ खराब हो चुकी है। करीब चार किमी करने पर जाखम रैंज का गेट आया। गेट पर बैरिकेट तो था,लेकिन कोई कर्मचारी नहीं था। गेट से भीतर प्रवेश किया। अब पूरा रास्ता कच्चा और उबड खाबड था। हमारी दाहिनी ओर जाखम डैम के कैचमेन्ट से बना पानी का विशाल तालाब नजर आ रहा था।
6 किमी चलने पर जाखम डैम आया। यह बान्ध 1964 में बना था। लेकिन अब यह एक्टिव बान्ध नहीं रह गया है। बान्ध के गेट हटा दिए गए है। यहां पर सरकारी कर्मचारी भी अब तैनात नहीं किए जाते। आसपास लगे बोर्ड से पता चला कि यहां के जलाशय में बडी संख्या घडियाल मौजूद है इसलिए इस पानी में उतरना खतरनाक हो सकता है। बान्ध की चौडाई और गहराई आदि की कोई जानकारी का बोर्ड आदि भी यहां मौजूद नहीं था।
कुछ देर बान्ध पर रुक कर फोटो विडीयो आदि बनाए और यहां से लौट गए। उबड खाबड कच्चा रास्ता पार करके कुछ ही देर में फिर से प्रतापगढ वाले रास्ते पर आ गए। प्रतापगढ से चल पडे रतलाम की ओर। अरनोद के गौतमेश्वर जाने की मेरी इच्छा थी, लेकिन मलय को रात को ट्रेन पकडना थी,इसलिए गौतमेश्वर के दर्शन को अगली यात्रा के लिए बाकी रख कर आगे बढ गए। सुबह खाए आलू के पराठों से पेट भरा हुआ था और कोई भी भोजन करने को तैयार नहीं था। इसलिए लगातार चलते रहे। रास्ते में एक जगह रुक कर गन्ने का रस पी लिया,जिससे भोजनकी जरुरत और भी कम हो गई। लगातार चलते हुए दोपहर साढे तीन बजे हम रतलाम पंहुच गए।
इस तरह उडन गिलहरियों के साथ जंगल की एक रात की कहानी समाप्त हुई।
समाप्त।
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