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24 जुलाई 26 शुक्रवार (सुबह 8.54)
होटल चूटानी,फिरोजपुर झिरका
इस वक्त हम हरियाणा के मेवात इलाके के फिरोज पुर झिरका के इस होटल में हैं और इस यात्रा के अंतिम सफर की तैयारी में है। ये वही होटल है,जिसमें एक बार हम लद्दाख जाते वक्त रुके थे।
कल सुबह हम करीब 10.30 पर उस होटल से निकल गए थे,जहां रुके थे। कल डायरी लिखते समय होटल और जगह का नाम याद नहीं था,इसलिए सुबह फोटो खींच लिया था। होटल का नाम था ,्टार लाइट और जगह थी जयलगढ। वहां से सीधे चले। करीब एक बजे हम हरिद्वार पार कर चुके थे। हरिद्वार से दिल्ली के रास्ते में एक जगह सडक किनारे आम बेचने वाले बैठे थे। एक जगह रुक कर पूछताछ की। ये चोसू आम बेच रहे थे। आम चखे तो मजा आया। 300 रु. में चोसू आम की एक पेटी खरीदी। जामफल भी खरीदे। वहीं एक एक आम कटवा कर खाया। जामफल भी खाए। आगे बढे। हरियाणा चल रहा था।
ताउ का होक्का नाम देखकर एक ढाबे पर रुके। इस वक्त 3.45 हो रहे थे। हुक्के में दम लगाकर भोजन किया। आगे बढे। शाम करीब 6.00 बजे हम दिल्ली के वेस्टर्न पैरिफेरल रोड पर पंहुच गए। एक सवा घण्टे में 110 का वेस्टर्न पैरिफेरल रोड पार करते हुए हमने दिल्ली पार कर ली। अब हम एक्सप्रेस वे 8 लेन पर आ गए थे। शाम के 7.00 बज चुके थे। 8 लेन के दो रेस्ट एरिया में रुकने की जगह ढूंढी। पहले रेस्ट एरिया में कुछ नहीं था। दूसरे रेस्ट एरिया में अपना घर नामक रात गुजारने की सरकारी व्यवस्था ती। यहां सरकार ने सिर्फ पुरुषों के लिए एसी डोरमैट्री बना रखी है,जो कि सौ.रु. प्रति व्यक्ति के दाम पर उपलब्ध है। लेकिन हमें ये जगह जमी नहीं। फिरोजपुर झिरका यहां से 30 किमी आगे था। यही तय हुआ कि झिरका में ही रुकेंगे। कुछ कुछ याद था। 8 लेन से उतर कर सीधे जाना है और दाए मुडने पर आगे जाकर वही होटल है जहां हम पहले रुके थे।
झिरका में कुछ देर इधर उधर घूमने और पूछताछ करने पर आखिरकार यही होटल मिला। यहां आकर पता चला कि इस होटल का नम्बर तो पहले से मोबाइल में सेव था। पहले ध्यान में आ जाता,तो बडी आसानी हो जाती। खैर चूटानी होटल में कमरा लिया,खाना पीना हुआ और सौ गए।
इस वक्त अब सभी लोग तैयार हो रहे हैं। अगले एक घण्टे में निकलने की तैयारी है। मन्दसौर में परम्परागत पार्टी की तैयारीहै। रतलाम से भी मित्र लोग आने वाले है। तो अब निकलने की तैयारी।
25 जुलाई 26 (रात 8.30)
इ खबरटुडे आफिस
यात्रा बीती रात करीब 2.00 बजे घर पंहुचकर समाप्त हो गई थी। कल का घटनाक्रम आज आफिस में लिख रहा हूं।
कल सुबह फिरोजपुर झिरका के चूटानी होटल से करीब दस बजे निकले। होटल के नीचे चावला मिष्ठान्न भण्डार पर पनीर पकौडे और समोसे का नाश्ता किया। यहां चाय उपलब्ध नहीं थी। इसलिए यहां से निकले। 8 लेन रोड पर चढे और 8 लेन के पहले सर्विस और रेस्ट एरिया में रुक कर प्रति चाय 40 रु. वाली महंगी चाय पी। फिर 8 लेन पर तेज गति से बढ गए।
8 लेन से जाते समय रास्ता पूरा चालू था,केवल मुकुन्दरा हिल्स की टनल में से गुजरने पर रोक थी,इसलिए वहां 8 लेन से उतरना पडा था। लेकिन इधर से लौटते वक्त सवाई माधोपुर के एक्जिट पर आगे का रास्ता बन्द कर दिया गया था और हमें एक्जिट से बाहर कर दिया गया। हमे उम्मीद थी कि हम 5 बजे या इससे भी पहले मन्दसौर पंहुच जाएंगे। मन्दसौर के पित्या गांव में एक शानदार फार्म हाउस पर समापन की पार्टी रखी गई थी,जिसमें रतलाम के कई लोग आने वाले थे।
सवाई माधोपुर के एक्जिट से जब उतरे तो पूछताछ करने पर पता चला कि अब 60 किमी के बाद फिर से 8 लेन मिलेगा। पहले तो हम एटलेन से बाहर निकल गए थे। 4-5 किमी आगे भी चले गए। ये रास्ता बेहद खराब था,इसलिए सोचा कि एटलेन पर ही कुछ किमी उलटा,रांग साइड चल लेंगे,तो समय बच जाएगा। यही सोचकर फिर से एटलेन पर गए और उपर चढे। रांग साइड जाने की कोशिश की,लेकिन एनएचएआई वालों ने पहरेदारी लगा रखी थी,इसलिए हम जा नहीं पाए और हमें फिर एक्जिट से बाहर निकलना पडा। इस सारी मशक्कत में समय बचने की बजाय करीब आधा घण्टा खराब हो गया। अब मजबूरी मे उसी रास्ते पर 60 किमी चले। कहीं घटिया,कहीं अच्छा रास्ता था। इसी रास्ते पर चलने के दौरान एक होटल में भोजन किया और आगे बडे। करीब डेढ घण्टे में फिर से चेचट पंहुचकर एटलेन पर चढे। 8 लेन पर करीब एक घण्टे चलने के बाद फिर मुकुन्दरा हिल्स की टनल से पहले नीचे उतरना पडा। ये करीब 20 किमी का रास्ता है। पूरी पहाडी का चक्कर लगाकर दूसरी ओर जाना पडता है। इस रास्ते में अक्सर जाम लग जाता है। जाते वक्त जाम नहीं मिला था,लेकिन आज भारी जाम लग रहा था। 20 किमी का ये रास्ता पार करने में 6.30 हो गए। यहां से फिर एटलेन पर पंहुचने के बाद मन्दसौर का रास्ता दो घण्टे का था।
रतलाम से किशोर,सचिन,रितेश,विवेक,टोनी,राजेश घोटीकर,टोनी,भट्ट सा.और नायडू जी वहां पंहुचे हुए थे। मन्दसौर के भी कई सारे साथी स्वागत के लिए मौजूद थे। स्वागत सत्कार के बाद दोस्तों का मिलना मिलाना हुआ। करीब 10.45 पर मन्दसौर से निकले।
एटलेन के अंतिम घण्टों में यात्रा का हिसाब भी कर लिया गया। यात्रा पर कुल करीब 66 हजार रु. से कुछ अधिक का खर्च हुआ था। प्रत्येक व्यक्ति को करीब साढे सौलह हजार रु.का खर्च आया था। सभी का हिसाब किताब हुआ। इस यात्रा में हमने संतोष घोडेटा की आर्टिगा कार से कुल 2880 किमी का सफर तय किया।
मन्दसौर से रात 10.45 पर निकले,तो जावरा में यात्रियों की गाडियां और सामान बदल लिया। इसमें दशरथ जी अर्टिगा लेकर सीधे नगरा पंहुच गए,जबकि पंवार सा.किशोर के साथ अपने घर पंहुच गए। मुझे टोनी ने रात करीब 2.00 बजे घर छोडा और इस तरह पंचकेदार की यह यात्रा तीन केदार के दर्शनों के साथ सम्पन्न हुई। चतुर्थ केदार रुद्रनाथ के दर्शन अगले समय के लिए बाकी है।...
समाप्त।
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