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22 जुलाई 26 बुधवार (प्रात: 7.30)
इस समय हम मंदिर जाने के लिए तैयार हो रहे हैं। मंदिर के तप्त कुण्ड पर स्नान करेंगे,दर्शन करेंगे और बद्रीनाथ धाम से प्रस्थान कर देंगे।
23 जुलाई 26 गुरुवार (प्रात: 9.30)
होटल स्टारलाइट
इस वक्त हम देवप्रयाग से कुछ 20 किमी पहले एक होटल स्टारलाइट में रुके हुए हैं और यहां से हरिद्वार होते हुए आगे जाने वाले है। होटल का कमरा,बेहद शानदार लोकेशन पर है। कमरे की बाल्कनी के सामने ही बेहद नजदीक अलकनन्दा नदी तेज आवाज के साथ बह रही है। नदी की कल कल छल छल के बीच में मैं डायरी लिख रहा हूं।
मेरे सभी साथी एक एक करके तैयार हो रहे हैं।
अब बात कल की,सुबह करीब 8 बजे हम लोग मन्दिर पर पंहुच गए। पहले तप्त कुण्ड में स्नान का आनन्द लिया। इससे पिछली शाम को तप्त कुण्ड में पानी इतना गर्म था कि कुण्ड में उतर नहीं पा रहे थे,लेकिन इस वक्त कई सारे लोग तप्त कुण्ड में उतरे हुए थे। हम भी कुण्ड में उतर गए। स्नान का भरपूर आनन्द लिया। स्नान करके उपर मन्दिर में पंहुचे। आज भी मन्दिर में बिलकुल भी भीड नहीं थी। दो बार दर्शन किए,ताकि दो बार प्रसाद ले सके। बाहर निकल कर फोटो विडीयो बनाए। कल आई को विडीयो काल पर मन्दिर के दर्शन नहीं करवा पाया था। आज मन्दिर के दर्शन करवाए।
फिर मन्दिर से निकले। वहीं एक रेस्टोरेन्ट में सब्जी पुडी का नाश्ता किया। बद्रीनाथ में भोजन बहुत महंगा है। 4 पुडी और सब्जी 120 रु. की। सब्जी पुडी का नाश्ता करके होटल लौटे। फौरन सामान पैक किया और निकलने को तैयार हो गए।
प्रकाश राव ने सुझाव दिया कि माणा चलना चाहिए। माणा में पाण्डवों की मूर्तियां लगाई गई है,उसे देखना चाहिए। थोडी ना नुकुर के बाद सब लोग माणा के लिए चल पडे। माणा के द्वार पर पंहुचकर फिर एक बार मन हुआ कि लौट जाए,लेकिन नवाल सा. ने 50 रु.की रसीद का हवाला दिया जो माणा जाते वक्त कटवानी पडती है। तो सोचा,चलो गांव के भीतर चल ही लेते हैं। पहले 2015 में यहां आए थे,फिर सतोपंत ट्रैक के समय भी आए थे। उसके बाद हेमकुण्ड के लिए पारिवारिक यात्रा के दौरान माणा से वसुधारा तक गए थे। लेकिन अब माणा पूरी तरह बदल गया है। मकान पक्के हो गए है। कई सारे होम स्टे और रेस्टोरेन्ट चालू हो गए है।
सबसे बडा परिवर्तन यह है कि माणा भारत के अंतिम गांव से अब प्रथम गांव बन गया है। इसी तरह अंतिम चाय की दुकानें अब पहली चाय की दुकानें बन गई है।
हम पैदल चलते चलते,सरस्वती नदी के उद्गम तक पंहुच गए। यहां भी सबकुछ बदल गया है। भील शिला,पहले अलग से दिखाई देती थी। साफ दिखता था जैसे इस शिला को भीम ने उठाकर नदी के दोनो किनारों पर रखा था,ताकि तेज बहाव वाली नदी पर पुल बन जाए औ ्र नदी पार की जा सके। लेकिन इस शिला पर अब पक्का निर्माण हो गया है,इसलिए शिला दिखाई ही नहीं देती है। यहां अब सरस्वती माता का मन्दिर भी बन गया है। मन्दिर में सरस्वती माता के अलावा ,स्पर साम्राज्ञी लता मंगेशकर,संत ज्ञानेश्वर,संत तुकाराम और अक्का----- आदि की भी प्रतिमाएं है।
यहां से निकलकर जहां से वसुधार का रास्ता शुरु होता है,वहीं पांचों पाण्डवों,द्रौपदी और श्वान की मूर्तियां इस तरह लगाई गई है,जैसे वे स्वर्गारोहण के लिए ही जा रहे हो। एक के पीछे एक चलते हुए।
माणा में जब लौटने लगे तो,एक रेस्टोरेन्ट में माणा की लोकल डिश: मंडुआ की रोटी- और गहत की भरवा रोटी उपलब्ध होने का बोर्ड नजर आया। बडी इच्छा थी,पहाड की लोकल डिश चखने की। रेस्टोरेन्ट के मालिक से पूछा तो उसने बताया कि मंडुक्चा इधर का पहाडी अनाज है,उसकी रोटी बनाई जाती है। इसी तरह गहत की भरवा रोटी पराठे की तरह होती है। मंडुवा की रोटी के साथ स्पेशल मिक्स दाल और चटनी परोसी जाती है। हमने चखने के हिसाब से एक एक प्लेट दोनो आईटम मंगवा लिए। खाने में सचमुच आनन्द आ गया। अब यहां से हमें सीधे निकल पडना था। इस वक्त दोपहर के 12 बज गए थे।
माणा से सीधे चल पडे हरिद्वर के रास्ते पर। रास्ते में पीपल कोटी के बाद में लंगासू पडता है,जहां 2015 की पारिवारिक यात्रा में हमने संतोष जी का जन्मदिन मनाया था। यहां का महालक्ष्मी पैलेस होटल,एक भाजपा नेता टीकाराम मेखुरी का है,जिनसे उसी वक्त परिचय हुआ था। पिछली बार भी उनसे मुलाकात हुई थी। इस बार भी फोन लगाया,सोचा भोजन वहीं करेंगे। टीकाराम जी मिले तो सही,लेकिन उतना उत्साह नहीं था,जितनी हमे अपेक्षा थी। खैर यहां भोजन किया और आगे बढे,तो शाम को देव प्रयाग से कुछ पहले इस होटल में रुक गए,जिसका नाम डायरी लिखते वक्त याद नहीं था।
अब यहां से निकलने की तैयारी है।
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