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1 दिसम्बर 25 दोपहर 1.20
ट्रेन न.12978 मरुसागर एक्स (कोच न.बी-5 17,18,20)
उम्मीद के खिलाफ हमारी ट्रेन ज्यादा लेट नहीं हुई। निर्धारित समय 12.35 का था और ट्रेन 1.10 पर आ गई वरना इस इलाके में सिंगल लाइन होने की वजह से गाडियों का लेट होना आम बात है।
हम लोग बिना किसी समस्या के ट्रेन के आने से 10 मिनट पहले सिंघुदुर्ग स्टेशन पर आ गए और ट्रेन आने पर उसमें सवार हो गए। पाटिल सा.और यश पाटिल हमें छोडने आए थे। उनसे बिदा ली और ट्रेन चल पडी। अब ट्रेन गंतव्य की ओर दौड रही है,जबकि यात्रा की यादें पीछे ले जा रही है।
28 नवंबर-
हमने तय किया था कि आज हम हाथ काटो स्तंभ सबसे पहले देखेंगे। होटल से चैक आउट करना था,लेकिन हाथ काटो स्तंभ इसी तरफ ओल्ड गोवा में था। होटल से चैक आउट करके लगेज वहीं रिसेप्शन पर रखकर हम हाथ काटो स्तंभ के लिए निकल पडे।
हाथ काटो स्तंभ पणजी से करीब 12 किमी दूर पणजी कुडाल हाईवे पर ही है। हाईवे का आरओबी उपर से निकल रहा है और इस आरओबी के नीचे ही हाथ काटो स्तंभ मौजूद है।ये बेहद ऐतिहासिक स्तंभ है,लेकिन कमाल ये है कि यहां इसके बारे में एक बोर्ड तक लगा हुआ नहीं है। बाहर के लोग तो ठीक,गोवा के ही 90 प्रतिशत स्थानीय निवासियों को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है।
वास्तव में हाथ काटो स्तंभ,गोवा में ईसाई मिशनरियों के अमानवीय अत्याचारों का जीवंत प्रमाण है। इस स्तंभ पर एक साथ तीन हजार से ज्यादा हिन्दुओं के हाथ इसलिए काट दिए गए थे,क्योंकि उन्होने इसाई मत स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। सौलहवीं सदी में पुर्तगाली ईसाईयों नेगोवा पर आक्रमण किया और फिर यहां शुरु हुआ इन्क्विजेशन का सिलसिला। इन्क्विजेशन का शाब्दिक अर्थ तो न्यायिक जांच होता है,लेकिन वास्तविकता में इस शब्द का उपयोग ईसाई लोग गैर ईसाईयों पर अत्याचार करने के लिए करते हैं। ईसाई शासन में गैर ईसाइयों की जांच इसलिए की जाती है कि वे किसी अन्य मत को मानते हैं। इन्क्विजेशन में गैर ईसाईयंो को इसाई मत नहीं अपनाने के लिए दण्डित किया जाता है। जैसे तीन हजार से ज्यादा हिन्दुओं के हाथ सिर्फ इसलिए काट दिए गए,क्योंकि वे ईसाई बनने को राजी नहीं थे।
इसी का गवाह ये हाथ काटो स्तंभ है। वैसे यह माना जाता है कि यहां एक प्राचीन शिव मन्दिर था और यह स्तंभ उस शिव मन्दिर का दीप स्तंभ था। इस मन्दिर को पुर्तगालियों ने ध्वस्त कर दिया और इस स्तंभ का उपयोग हिन्दुओं के हाथ काटने के लिए किया गया।
इस स्तंभ के इतिहास को अभी भी छुपा कर ही रखा जा रहा है। हांलाकि अब हिन्दू संगठन इसे संरक्षित स्मारक घोषित करने की मांग कर रहे हैं,लेकिन पुरातत्व विभाग ने अभी तक इसे अपने अधीन नहीं किया है। विडम्बना देखिए कि जिस पादरी आगस्टीन ने गोवा में हिन्दुओं पर सबसे ज्यादा अत्याचार किए उसे संत का दर्जा देकर रखा गया है। उसके शव को आज भी सुरक्षित रखा हुआ बताया जाता है और इस चर्च को देखने हर वह पर्यटक आता है,जो गोवा घूमने आता है। उसे लगता है कि कि वह किसी महान संत का चर्च देख रहा है,उसे बताया भी यही जाता है। लेकिन गोवा में पुर्तगाली ईसाईयों,पादरियों और शासकों ने हिन्दुओं पर जो अमानवीय अत्याचार किए उसके बारे में कभी कुछ नहीं कहा जाता,ना ही बताया जाता है।
बहरहाल हमने यहां एक विडीयो बनाया और यहां से होटल वैलनकन्नी वापस लौटे। अपना सारा लगेज स्कूटर पर लेकर अब मैं और वैदेही पणजी के नए होटल वीरा श्री में पंहुचे। यहां आकर चैक इन किया। होटल के ठीक सामने महालक्ष्मी मन्दिर और राधाकृष्ण मन्दिर है।होटल से निकल कर दोनो मन्दिरों के दर्शन किए। महालक्ष्मी मन्दिर करीब दो सौ वर्ष पुराना है और काफी भव्य है। यहां विडीयो आदि बनाने के बाद निकले। इस वक्त करीब 1.30 बज रहा था। हमने सोचा क्यो ना किसी नए बीच पर जाकर भोजन करें। नया बीच ढूंढने निकले बम्बोलीम। बम्बोलिम बीच ढूंढते ढूंढते जहां पंहुचे,वहां समुद्र तो था,लेकिन बीच पर लगने वाली दुकानें आदि कुछ भी नहीं था। यहां भोजन की कोई सुविधा नहीं थी। फिर घूमते घूमते उसी डोनापाला बीच पर जा पंहुचे,जहां कल गए थे। आज यहां एक नए होटल में भोजन किया और करीब साढे तीन बजे होटल लौटे। आइएफएफआई (इफ्फि) के हमारे कार्ड अब हमको मिल चुके थे। समापन समारोह डा.श्यामाप्रसाद मुकर्जी इनडोर स्टेडियम में शाम 5 बजे था।
हम काफी थके हुए थे,इसलिए आराम करने लगे। हमने सोचा था कि हम शाम 6,6.30 तक कार्यक्रम में जाएंगे। 6.15 पर हम होटल से निकले। स्टेडियम करीब सात किमी दूर कुडाल हाईवे पर ही था।
समापन समारोह में सुपरस्टार रजनीकान्त,रणवीर सिंह,नवाजुद्दीन सिध्दिकी,गोवा सीएम प्रमोद सावन्त,जैसी हस्तियां मौजूद थी। करीब डेढ घण्टे यहां रुके और करीब नौ बजे होटल लौट आए।
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