Monday, June 15, 2026

गोवा यात्रा-6/ चमत्कारिक वेतोबा देव,जिन्हे चढाते हैं विशाल चप्पलें और रेडी के चमत्कारिक गणेश जी

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30 नवंबर 25 रविवार

पणजी-कुडाल


रात को काफी देर हो गई थी इसलिए सुबह उठने में देर हो गई। मुझे पूरा अंदाजा था कि पाटिल सा. 8-8.30 तक आ जाएंगे। वे ठीक 8.30 पर आ गए। हम जल्दी जल्दी तैयार हुए और 9.30 तक पणजी से कुडाल जाने के लिए रेडी हो गए। एक बार फिर सामने महालक्ष्मी मन्दिर में जाकर दर्शन किए और कुडाल के लिए निकल पडे।


गाडी यश चला रहा था। चिंतन तो देर तक सोता रहा और बिना नहाए धोए गाडी में सवार हो गया। पाटिल सा. ने कहा था कि नाश्ता रास्ते में एक प्रसिध्द होटल पर करेंगे,जहां कोंकणी डिशेज मिलती है। दोपहर करीब ग्यारह बजे वह जगह आई,जहां नाश्ता करना था। यहां उसळ मिसळ के साथ घावणे का नाश्ता उपलब्ध था। उसळ तो हम जानते ही है,लेकिन पहली बार उसळ मिसळ का अन्तर पता चला। जिस उसळ में उपर से मिक्स्चर डालते है,वह मिसळ बन जाती है। घावणे,चावल से डोसे जैसी चीज बनाई जाती है,उसे कहते है। मिसळ या उसळ को घावणे के साथ खाया जाता है। यह चावल की रोटी या रेलमे जैसा होता है. इसके अलावा एक स्वीट डिश शिरवणे भी थी,जो कि सेवईया की खीर जैसी थी। इस छोटे से रेस्टोरेन्ट में भारी भीड थी और सारे टेबल फुल थे। करीब 15-20 मिनट के इंतजार के बाद हमे टेबल मिली। हमने मिसळ घावणे मंगवाए। मैं गाडी में से सेव का पैकेट ले आया। रतलामी सेव के साथ मिसळ बहुत टेस्टी हो गई। मजेदार नाश्ते के बाद शानदार चाय पी और कुडाल के लिए बढ गए। हम लोग करीब साढे बारह बजे कुडाल पंहुच गए। 


कुडाल में मामा (भानुदास रेगे),मामी के साथ संगीता से मुलाकात हुई। भानू मामा 95 में चल रहे हैं,लेकिन फुल फिट है। मामी 89 की है। वह भी फिट है। कुडाल में पाटिल सा. ने पहले से घूमने का कार्यक्रम बनाकर रखा था। भोजन के बाद करीब 3.45 पर आर्टिगा से मामा-मामी के साथ हम सभी निकले। सबसे पहले पाटिल सा. की कुलदेवी चामुण्डेश्वरी देवी के दर्शन किए,जो कि आन्दुर्ले गांव में है। वहां से वेतोबा देव के मन्दिर में पंहुचे। 


वेतोबा देव का मन्दिर चमत्कारिक मन्दिर है। यह पूरे देश में शायद इकलौता मन्दिर है,जहां श्रध्दालु अपनी मनौती पूरी होने पर व्तोबा देव को विशालकाय चप्पलें चढाते हैं।  वेतोबा देव के लिए दो-दो या तीन तीन फीट की विशाल कोल्हापुरी चप्पलें बनाई जाती है। 

कथा यह है कि वेतोबा असल में वेताल है,जिसे मराठी में वेतोबा कहा जाता है। वेतोबा रक्षणकर्ता देव हैं जो अपने भक्तों की संकटों से रक्षा करते है। वे पूरे कोंकण क्षेत्र में घूमकर क्षेत्र की रक्षा करते है। वे पूरे क्षेत्र में भ्रमण करते हैं इसलिए उन्हे चप्पलें भेंट की जाती है। चमत्कार यह है कि व्तोबा को भेंट की गई चप्पलें,कुछ समय के बाद ऐसी हो जाती है,जैसे इन्हे पहन कर मीलों तक चला गया हो। ये चप्पलें मन्दिर में रखे रखे ही घिस जाती है। इस तरह की ढेरों चप्पलें मन्दिर में रखी गई है। भक्तजन भगवान वेतोबा को नमन करने के साथ ही इन चप्पलों को भी प्रणाम करते हैं और इन्हे अपने सिर से लगाते है।


वेतोबा देव के दर्शनों के बाद हम यशवन्तगढ का किला देखने पंहुचे। यहीं समुद्र भी है। हम पंहुचे,तब तक सूर्यास्त हो चुका था और अंधेरा धीरे धीरे फैलने लगा था। समुद्र के किनारे 10-15 मिनट गुजार कर लहरों को निहार कर रेडी के स्वयंभू गणपति के दर्शनों के लिए पंहुचे। यह भी एक चमत्कारिक मन्दिर है। यहां गणपति स्वयं अपनी इच्छा से विराजित हुए हैं।


वर्ष 1972 में यहां की एक माइनिंग कम्पनी के ड्राइवर को सपने में गणेश जी आए और उन्होने ड्राइवर से कहा कि अमुक स्थान पर मेरी प्रतिमा दबी हुई है,उसे खुदाई करके बाहर निकालो। सपने में मिले गणेश जी के आदेश के बाद ड्राइवर ने कुछ गांव वालों को साथ लेकर गणेश जी के बताए स्थान पर खुदाई शुरु की। दो दिन की खुदाई के बाद,गणेश जी के कान वाला हिस्सा दिखाई दिया। फिर और लोग जुडे। करीब एक महीने की खुदाई के बाद गणेश जी की विशाल प्रतिमा सामने आई। एक दिन बाद मूषक महाराज भी सामने आ गए। जिस स्थान पर गणेश जी प्रकट हुए थे,उसी स्थान पर उन्हे रखते हुए मंदिर का निर्माण किया गया जो आज भव्य मन्दिर के रुप में मौजूद थे। गणेश जी की यह विशाल प्रतिमा एक ही पत्थर में तराशी हुई है और कमाल ये है कि प्रतिमा पूरी तरह सुरक्षित मिली है। यह माना जाता है कि यह महाभारतकालीन है। स्वयंभू गणपति के प्रति लोगों में जबर्दस्त आस्था है।


इस वक्त शाम के 7.30 हो चुके थे। अंधेरा फैल चुका था। अब भोजन की बारी थी। भोजन के लिए हम लोग गोवा की सीमा के भीतार अंकिता रेस्टोरेन्ट नामक एक प्रसिध्द होटल में पंहुचे,जहां बाहर ही दर्जनों गाडियां नजर आई। यहां कई तरह के सी फुड्स का आनन्द लेने के बाद हम रात करीब साढे ग्यारह बजे वापस कुडाल पंहुचे। 


1 दिसम्बर 2025

मरुसागर एक्सप्रेस शाम 7.45

हमारी ट्रेन कोंकण क्षेत्र के पहाडी इलाके को छेडकर अब पनवेल के निकट आ गई है। कोंकण में सिंगल लाइन की वजह से ट्रेन के लेट होने की संभावना रहती है,लेकिन अब डबल लाइन है और इन्टरनेट के मुताबिक ट्रेन एकदम सही समय सुबह 5.50 पर रतलाम पंहुच जाएगी। चिंतन वडोदरा में उतरने को कह रहा है। वडोदरा में ट्रेन रात पौने दो बजे पंहुचेगी। हम सुबह ट्रेन से उतरेंगे। तब जाकर यह यात्रा पूरी होगी। लेकिन यात्रा वृत्तान्त यहीं पूरा हो गया है।


समाप्त।

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