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16 जुलाई 2026 (रात 10.55)
चोपता तुंगनाथ
इस वक्त तारीख बदलने में एक घण्टा बाकी है। हम लोग चोपता आ चुके है और एक होटल में 4 बेडेड रुम दो हजार रु.में लेकर रुक चुके है। मेरे सभी साथी सौ चुके है और मैं डायरी के साथ हूं। आज की रात यहां पंहुचने के बाद गाडी का माइलोमीटर 1205 किमी पर पंहुचा है,यानी आज हमने चार सौ पांच किमी की दूरी तय की है।
आज की सुबह मेरठ के पास परतापुर के एक होटल में हुई थी,जहां से हम बिना स्नान किए निकल गए थे। प्रकाश राव का कहना था कि हर की पौडी में डुबकी लगाकर ही आगे जाना है। सबका कहना था कि लौटते समय गंगा जी में डुबकी लगाएंगे। लेकिन आखिरकार प्रकाशराव की ही बात मानी गई और बिना स्नान के परतापुर से निकल गए।
सुबह करीब आठ बजे परतापुर से निकले। यहां से हरिद्वार तीन घण्टे का रास्ता था। रास्ते में एक ढाबे पर रुक कर आलू के पराठे खाए। 550 रु. का भुगतान किया। आगे बढे। 11.15 पर हरिद्वार पंहुचे। आजकल शानदार हाईवे बन चुका है। कहीं कोई समस्या नहीं। हर की पौडी की दूसरी तरफ से पंहुचे और पार्किंग में गाडी लगाई। गाडी लगाकर गंगा स्नान के लिए चले। इस स्नान के लिए हें करीब एक किमी पैदल चलना पडा।
जिस स्थान पर स्नान कर रहे थे,वहां से मात्र 50 मीटर की दूर अचानक एक डेडबाडी बोरे में बंधी हुई आ गई। लोगों की भीड लग गई। कई लोग तो बिना स्नान के ही बाहर निकल गए। हमने भी देखा,थोडी देर इंतजार किया। बहता पानी था,थोडे इंतजार के बाद फिर गंगा मैया में डुबकी लगाई और हरिद्वार से आगे बढ गए।
हरिद्वार से चले। हमें जाना था,चोपता। इसके लिए गूगल मैप रुद्रप्रयाग से रास्ता बदल रहा था। रास्ते में करीब 2.25 पर एक होटल में लौकी की सब्जी और दाल के साथ रोटी का भोजन किया। आगे बढे। हरिद्वार से हमारी मंजिल 170 किमी दूर थी और गूगल मैप इसके लिए 6-6.30 घण्टे का समय बता रहा था। हमने सोचा कि अगर हम 7.00 बजे तक भी चोपता पंहुच जाते है तो शाम को ही पैदल चल कर तुंगनाथ पंहुच जाएंगे और वहीं रुकेंगे। लेकिन जब चोपता के नजदीक पंहुचे तो पता चला कि ये वो चोपता नहीं है। असली चोपता तुंगनाथ तो यहां से 70 किमी दूर है। असली तुंगनाथ जाने के लिए उखीमठ ही जाना होगा। शाम के करीब 7 बज चुके थे। उखीमठ करीब 40 किमी दूर था और 1 घण्टे का समय लगना था।
यह तय किया गया कि अब उखीमठ में रात गुजारेंगे और सुबह असली चोपता पंहुच कर तुंगनाथ जाएंगे। हम लोग करीब 8 बजे उखीमठ पंहुचे। मैं और प्रकाश राव दोनो ही उखीमठ में ही रात रुकना चाहते थे,लेकिन नवाल सा.और दशरथ जी सीधे चोपता जाना चाहते थे। आशु का कहना था कि चन्द्रशिला का सूर्योदय देखना ही बडी उपलब्धि होती है। अगर हम रात को ही चोपता पंहुचते है तो सुबह 2.00 बजे उठकर ट्रैक शुरु करेंगे और चन्द्रशिला पंहुच कर सूर्योदय देखेंगे। दो-दो की बराबरी थी,इसलिए फैसला टास करके किया। टास मे चोपता जाने वाले जीत गए और हम चलते चलते आखिरकार 8.30 पर चोपता आ गए।
उखीमठ से चोपता का करीब 28 किमी का रास्ता बेहद खतरनाक और डरावना है। सिंगल पट्टी की सडक। रात का वक्त। हम चले तो 5-7 किमी चलने पर ही बारिश मिल गई। तेज बारिश में ऐसे घुमावदार रास्तों पर गाडी चलाना बेहद खतरनाक होता है। लेकिन क्या करे? चल पडे तो चल पडे। कहीं तेज बारिश थी,तो कहीं धीमी। आखिरकार हम 8.30 पर चोपता पंहुच ही गए। यहां तेज बारिश हो रही थी। चोपता के प्रवेश से ही गाडियों की भीड नजर आ रही थी। पहले जब 2015 में यहां आए थे,तब यहां टूरिस्ट नाम की चीज नहीं होती थी। लेकिन अभी गाडियों की भीड देखकर डर लगा कि रात रुकने की जगह भी मिलेगी या नहीं?बरसते पानी में एक होटल वाले ने 4 बेडेड रुम दिकाया। किराया 2 हजार रु। हम तुरमत राजी हो गए। कमरा ठीक किया। कमरे में आए। कमरे में मित्रों की चर्चा हुई। पता चला कि नोटवर्क उपर जाकर मिलेगा। करीब 500 मीटर उपर जाकर घर पर वैदेही से बात की। माताराम ठीक है। वहां से उतरकर रुम में आया। सब लोग सौ चुके हैं। मैं भी डायरी लिख चुका हंूं।
कल सुबह,यहां से तुंगनाथ और चन्द्रशिला की चढाई करेंगे। अगर मौसम ने साथ दिया तो। इस वक्त तेज बारिश हो रही है। देखते है सुबह क्या होता है?
अब एक खास बात। जब हम चोपता जाने या ना जाने के लिए टास कर रहे थे,उस वक्त आशुतोष ने झूठ बोलकर टास जीता था। तभी हम यहां आए,वरना हम उखीमठ में ही रुक जाते। यहां आने के बाद आशुतोष ने बताया कि टास के हेड टेल के बारे में उसे जानकारी ही नहीं है। टास के बारे में उसने झूठ बोला था और हम यहां आ गए। हांलाकि इस झूठ से कोई नाराज नहीं था।
बारिश अब भी हो रही है। देखते है सुबह क्या होता है...?
17 अगस्त 2026 शुक्रवार (दोपहर 2.23)
चोपता (चन्द्रशिला)
आज यात्रा का तीसरा दिन है। हम तुंगनाथ बाबा के दर्शन करके नीचे चोपता में लौट चुके हैं और भोजन का इंतजार कर रहे हैं।
बीती रात तेज बारिश हो रही थी,इसलिए जल्दी उठकर तुंगनाथ जाने का कोई मतलब नहीं था। फिर भी दशरथ जी और नवाल सा.का कहना था कि वे सुबह तीन बजे उठकर यात्रा शुरु कर देंगे। मैने और पंवार सा. ने साफ इंकार कर दिया। हमने कहा कि जब नींद पूरी होगी,तब उठकर जाएंगे। दशरथ जी और नवाल सा. जल्दी उठे,लेकिन बारिश जारी थी,इसलिए फिर सौ गए। फिर हम लोग सुबह करीब 7.30 पर उठे। फ्रैश होकर करीब 9.15 पर चलने को तैयार हो गए। पराठे का नाश्ता किया और 9.30 पर तुंगनाथ के लिए चल पडे।
मेरे साथ कुछ विचित्र हुआ। जैसे ही कमरे से बाहर निकल कर उपर होटल में आया,मुझे लगा कि सिर भारी हो रहा है। मैने नाश्ता करने से भी मना कर दिया। लेकिन फिर मुझे लगा कि कुछ खा ही लेना ठीक रहेगा। एक पराठा खाया। एक केला पडा था,वह भी खा लिया। चाय भी पी ली। अब जैसे ही चलना शुरु किया,फिर सिर में भारीपन महसूस हुआ। मुझे लगा कि हाई अल्टीट्यूड असर दिखा रहा है,जबकि हम काफी कम उंचाई पर थे।
मैने बेहद धीमी गति और छोटे कदमों से चलना शुरु किया। बहुत धीरे धीरे चलने से मैं काफी पीछे रह गया था। साथ में विडीयो भी बना रहा था।
यहां रास्ता बना हुआ है,लेकिन एकदम खडी चढाई है। बार बार दम फूल जाता है। लेकिन करीब एक घण्टे के बाद शरीर अभ्यस्त हो गया और अब मेरी गति भी बढ गई थी। इसके बाद तो हमने कई जगह लम्बे रास्तों को छोडकर सीधे पहाड ही चढ लिया। जिससे दूरी बहुत कम हो गई। हांलाकि इसमें चढाई और भी खडी हो जाती है। लेकिन पथरीली रपट की खडी चढाई से पहाड के कच्चे रास्ते पर सीधे चढना हमें आसान लगा। हम लोग करीब पौने तीन घण्टे में ही तुंगनाथ मंदिर पंहुच गए।
रात को हुई बारिश की वजह से जबर्दस्तधुंध छाई हुई थी और विजीबिलिटी बेहम कम थी। आसपास के पहाड तो नजर ही नहीं आ रहे थे। ऐसे में चन्द्रशिला जाने का कोई मतलब नहीं था। तुंगनाथ मन्दिर के दर्शन किए। वहां फोटो विडीयो बनाए। आई को भी विडीयो काल पर मंदिर के शिखर दर्शन करवा दिए।
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