(प्रारम्भ से पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे)
17 अगस्त शाम 7.00 बजे
रांसी गांव के होम स्टे में
दोपहर को डायरी लिख ही रहा था कि टोबल पर भोजन लग गया। हमने राजमा की सब्जी,दाल और रोटी का आर्डर दिया था। भूख तेज लगी थी,इसलिए डायरी वहीं छोडकर पहले पेट पूजा में जुट गए।
तुंगनाथ की यात्रा हम लोगों के लिए आसान ही थी,इसलिए हम महज पौने तीन घण्टें में मन्दिर पर पंहुच गए थे। रास्ते में ही हमें जानकारी मिली थी कि दोपहर बारह बजे मन्दिर के पट बन्द हो जाते है।इसलिए भी हम तेजी से चले और बारह बजे के पहले तुंगनाथ बाबा के दरबार में हाजिर हो गए।
पहले यहां आने वालों की तादाद काफी कम थी। इक्का दुक्का लोग ही यहां आते थे। बद्रीनाथ से लोटते समय ड्राइवर अपने पैसेंजरों को कहता था कि रास्ते में इण्डिया का स्विटजरलैण्ड यानी चोपता पडता है। अगर आप चाहे तो मैं आपको ले चलता हूं लेकिन इसके लिए आपको अलग से पैमेन्ट गेना होगा। ड्राइवर चोपता की जमकर तारीफें करता,फिर कहता कि उपर तुंगनाथ महादेव भी है,जो पंच केदार में से एक है।ड्राइवर के कहने से यात्री चेपता आ जाते थे। यहां रात गुजारते,कुछेक उपर तुंगनाथ जाने की हिम्मत जुटा लेते बाकी अधिकांश अगली सुबह उठकर निकल जाते थे। हम भी पिछली बार 2015 में ऐसी ही बातें सुनकर आए थे,लेकिन उस समय मैं चोपता से उपर तुंगनाथ नहीं गया था।
लेकिन अब यहां श्रध्दालुओं की भारी भीड है। कई लोग हमारी ही तरह पंच केदार की यात्रा पर ही आए हैं।
खैर हम लोग करीब पांच घण्टों में दर्शन करके लौट चुके थे। भोजन किया,चाय पी। हमारा इरादा यहां से तुंगनाथ जाने का था,लेकिन दशरथ जी ने होटल वाले से चर्चा की तो उसने बताया कि पहले मध्यमहेश्वर जाना ठीक रहेगा। इससे समय भी बचेगा। हमने भी मध्यमहेश्वर ही जाने का निर्णय लिया।
सारा सामान पहले ही गाडी में भर चुके थे। मध्य महेश्वर के लिए रांसी गांव से ट्रेकिंग शुरु होती है। रांसी चोपता से करीब 40 किमी दूर है। चोपता से उखीमठ होकर ही रांसी का रास्ता है।हम तीन बजे चोपता से चले। रास्ते में मधुगंगा नदी बह रही थी। नदी के पुल के पास एक जगह रुक कर चाय पी। हम शाम के करीब छ: बजे रांसी पंहुच गए।
रांसी में हम एक होटल या होम स्टे में रुक गए हैं। यहां कमरों में गीजर लगे हुए है। सुबह स्नान नहीं हुआ था। यहां आकर शेविंग की,स्नान किया। ट्रेक पेन्ट भी पानी से धो डाली। उम्मीद है सुबह तक सूख जाएगी।
रांसी में हमारा स्वागत फिर से बारिश ने किया। हांलाकि ये हल्की बूंदाबांदी ही थी,लेकिन कल चोपता पंहुचने पर तेज बारिश मिली थी। यहां भी बारिश मिली। अब बारिश रुक चुकी है। सुबह मध्यमहेश्वर के लिए ट्रैक शुरु करेंगे।
18 जुलाई 26 शनिवार(सुबह 6.45)
रांसी गांव होम स्टे
इस वक्त यहां रांसी गांव में जबर्दस्त धुंध छाई हुई है। यही गनीमत है कि बारिश नहीं हो रही है। हम लोग करीब छ: बजे ाजग गए थे। आज हम यहां से 15 किमी की दूरी पर और करीब साढे ग्यारह हजार फीट की उंचाई पर स्थित पंच केदार में से एक मध्य महेश्वर की यात्रा शुरु करेंगे।
रांसी गांव 6500 फीट की उंचाई पर है। यानी हमें करीब 4500 फीट की उंचाई पर चढना है। उम्मीद है कि यह चढाई उतनी खडी नहीं होगी,जितनी तुंगनाथ की थी। यहां रास्ते में दो गांव भी है,जहां रुकने खाने की सारी व्यवस्थाएं उपलब्ध है। उपर मध्य महेश्वर में भी ठहरने की सुविधा मौजूद है। हमे उम्मीद है कि हम तीसरे दिन दोपहर तक नीचे आ जाएंगे।
इस वक्त सभी साथी तैयार हो रहे है और अगले एक डेढ घण्टे में हमारी यात्रा शुरु हो जाएगी।
18 जुलाई 2026 (शाम 6.00)
कून चट्टी (मध्यमहेश्वर यात्रा मार्ग के बीच)
इस वक्त हम मध्यमहेश्वर से मात्र 2.50 किमी पहले कून की चट्टी नामक स्थान पर एक कमरा लेकर रुक गए हैं। हमें यहां आकर करीब 50 मिनट हो चुके है। यहां तक आने में हमने करीब 8.30 घण्टों में 12.50 किमी की दूरी तय कर ली है।
हम सुबह 8.25 पर अगतोली धार से चले थे। कहने को तो मध्यमहेश्वर का ट्रैक रांसी गांव से है,लेकिन रांसी गांव से 2 किमी आगे अगतोलीधार है,जहां तक वाहन जा सकते हैं। हम उसी अगतोलीधार में माउण्टेन व्यू नामक होटल में रुके थे।
अगतोली धार से पहला स्टाप गोण्डार गांव है,जो अगतोलीधार से 5 किमी दूर है। इस गांव तक जाने के लिए पहले पहाड से उथर कर मधुगंगा नदी के किनारे तक जाना पडता है,यानी लगातार 2.5 किमी तक तीखी ढलान का रास्ता है। मधुगंगा नदी को पार करने के लिए नदी के किनारों पर लकडी के दो पट्टे रख दिए गए हैं। नीचे खतरनाक तेज बहाव से मधुगंगा बह रही है और इन संकरें पट्टों पर कदन रखकर नदी को पार करना पडता है। नदी पार करते ही खडी चढाई शुरु हो जाती है। करीब 2.5 किमी की चढाई चढ कर हम गोण्डार पंहुचते हैं। हम करीब डेढ घण्टे में ही गोण्डार पंहुच गए थे। मध्यमहेश्वर की यात्रा की सारी व्यवस्थाएं गोण्डार गांव वाले ही करते है। यहां प्रत्येक यात्री का रजिस्ट्रेशन होता है और प्रति व्यक्ति 20 रु. वसूले जाते है।
गोण्डार पंहुचे। वहां हमने चाय पी और रजिस्ट्रेशन करवा कर फौरन आगे बढ गए। यहां से 2 किमी उपर वनतोली गांव है। वनतोली के उपर खड्डरा गांव है,जो वनतोली से 1.5 किमी उपर है। इसे आगे नानू नामक स्थान है,जो वनतोली से 305 किमी और खड्डरा 2 किमी उफर है। हमने यह सोचा था कि हमें आज ज्यादा से ज्यादा दूरी पार करना है। हम गोण्डार तो सुबह 10 बजे ही पंहुच गए थे। हमारा अंदाजा था कि हम एक डेढ बजे तक नानू पंहुच जाएंगे,तो वहीं जाकर भोजन करेंगे।
मधुगंगा के पुल को पार करने के जो चढाई शुरु होती है,वह लगातार जारी रहती है। इस चढाई में कहीं कहीं बहुत खडी चढाई है,तो कहीं चढाई कम तेज है।
पहाडों के दृश्य मनमोहक थे,लेकिन बादलों के साथ धुंध छाने लगी थी और दोपहर बारह के बाद तो धुंध ने सारे रास्ते पर कब्जा जमा लिया था। गनीमत यही थी कि बारिश नहीं हो रही थी।
कठिन और आसान चढाईयों पर चढते हुए हम बीच बीच में रुक कर उखडी हुई सांसों को व्यवस्थित करते हुए आगे बढ रहे थे। इसी तरह चलते चलते हम करीब 2.15 बजे नानू पंहुच गए। यहां एक दुकान थी,जहां यात्रियों की भारी भीड जमा हो गई थी। दुकानदार अकेला था। पराठे मैगी चाय इत्यादि बना रहा त। यहां मैने,दशरथ जी और नवाल जी ने एक के बाद एक करके चार पराठे खा लिए। चाय पी। यहां पर्याप्त आराम करने के बाद करीब 3.30 पर यहां से आगे बढे।
नानू से आगे मध्यमहेश्वर के बीच दो स्थान थे जहां रुकने की व्यवस्था थी। नानू से 2 किमी आगे मैखम्बा और वहां से 1.5 किमी आगे कून की चट्टी,जहां हम इस वक्त रुके हुए हैं।
नानू से आगे बढने पर नवाल सा. की इच्छा मैखम्बा में रुक जाने की थी,जबकि बाकी सभी कून की चट्टी तक जाने की इच्छा रखते थे। हमारा मानना यह था कि आज जितना आगे चले जाएंगे,कल उतनी ही ज्यादा आसानी होगी।
हम 3.30 पर चले तो करीब 4.30 पर मैखम्बा पंहुच गए। यहां एक कमरे के बारे में पूछताछ की तो उस महिला ने प्रति व्यक्ति एक हजार रु. का किराया बताया और जरा भी कम करने को राजी नहीं हुई।
इस वक्त तक हल्की बूंदाबांदी भी शुरु हो गई थी। उस महिला ने सोचा कि ये लोग गरजमंद है,लेकिन इसी बात ेस आशुतोष महाराज को गुस्सा आ गया और वे तेजी से आगे चल पडे। सबसे धीमे और सबसे पीछे रहने वाले आशुतोष महाराज सभी को पीछे छोडते हुए सबसे पहले कून की चट्टी पंहुच गए और पहले वाले ही कमरे को उन्होने पक्का कर लिया। हम सभी लोग 5.15 पर यहां पंहुच गए।
19 जुलाई रविवार (दोपहर 12.30)
नानू (मध्यमहेश्वर अगतोली धार मार्ग)
इस वक्त हम मध्य महेश्वर के दर्शन करके वहां से करीब 5.5-6.0 किमी नीचे उथर कर नानू में उसी दुकान पर रुके है,जहां जाते वक्त हमने पराठे खाए थे। प्रकाश राव और दशरथ जी मुझसे पहले यहां पंहुच गए थे। बाद में मैं आया और अभी नवाल सा. का इंतजार चल रहा है। इसी बाच एक आलू का पराठा भी आ चुका है,जिसे अभी निपटाया जाना है।
तो,अब कहानी वहां से जहां कल छोडी थी। हम कून की चट्टी पंहुच गए थे और वहां कमरा ले चुके थे। रात यहीं गुजारना थी। भोजन भी यहीं करना था। शाम 5.15-5.30 पर पंहुच गए थे। भोजन तो 8.30 पर ही निपट गया था। अब यहां पहाड में ना तो लाइट थी ना और कोई काम।
वहां तक पंहुचने में शरीर पर पहने हुए सारे कपडे पसीने में पूरी तरह भीग चुके थे। कपडे उतारना जरुरी था। जर्किन भी पूरी तरह गीली हो चुकी थी। ये कपडे उतारना जरुरी था। गनीमत ये थी कि मैं बैग में एक टीशर्ट रख लाया था। पसीने से गीले हुए शट4 और बनियान को उतारकर टीशर्ट पहन लिया। मुझे तो भोजन भी नहीं करना था। दशरथ जी और नवाल जी ने भोजन किया। प्रकाश राव ने एक उबला आलू लेकर उसमे नमक मिर्ची लगाकर और सेव मिलाकर खा लिया। अब सिर्फ सोना बाकी था। नौ बजे तक सौ गए तो एक डेढ बजे आंख खुल गई। लेकिन बाहर तेज बारिश हो रही थी। पहले इरादा था कि सुबह यहां से जल्दी चलेंगे,लेकिन पानी की आवाज सुनकर फिर सौ गए।अब उठे करीब 5.30 पर। बाहर उजाला हो चुका था और हल्की बूंदाबांदी जारी थी। धीरे धीरे उठे। फ्रैश हुए। यहां इसके अलावा सिर्फ मुंहधोया जा सकता था।मुंह धोया। कपडे पहने। पोंचू पहन कर करीब 6.45पर मध्य महेश्वर के दर्शनों के लिए चल पडे। पहाड पर लगातार चढाई। रास्ते में बारिश के पानी में गले हुए पत्तों का कीचड। फिसलन भरा रास्ता। धीरे धीरे कदम रखते,आखिरकार हम सुबह 8.30 पर मध्यमहेश्वर के मन्दिर पर पंहुच गए।
इस क्षेत्र में प्रवेश करते ही सामने से गुजरात के लोगों का एक दल मिला,जो यहां के पुजारियों को भला बुरा कह रहा था। उनका कहना था कि जो लोग पैसे दे रहे हैं उन्हे जल्दी दर्शन करवाए जा रहे हैं लेकिन जो सामान्य श्रध्दालु है,उन्हे 8.30 बजे के बाद दर्शन करने को कहा जा रहा हैं।
हम मन्दिर पंहुचे। दर्शन किए। मन्दिर के गर्भगृह के पट बन्द किए हुए थे। जबकि शिवमन्दिर चौबीसों घण्टों खुले रहते हैं। लेकिन यहां के पुजारियों ने कमाई का माडल बना रखा है,इसलिए शिव जी पर चढाए जाने वाला जल भी एक बाल्टी में डलवाया जा रहा था। शैव मत में केवल शिवलिंग ही ऐसा होता है,जिसे हर कोई छू सकता है,जबकि वैष्णव देवी देवताओं की प्रतिमाओं को स्पर्श नहीं किया जा सकता। लेकिन यहां तो शिव जी को भी भीतर बन्द करके रखा था।
दर्शन करने के बाद हम लोगों ने मैगी खाकर चाय पी और 9.45 पर वापस लौट कर कून की चट्टी आ गए। हम अपना सारा सामान यहीं छोडकर गए थे,जो हमें अब वापस लेकर नीचे जाना था। उम्मीद थी कि यहां पराठे मिल जाएंगे,लेकिन यहां फिर से एक एक मैगी ही खाने को मिली। मैगी और चाय का डोज लेकर 11.25 पर यहां से चल पडे।
कून की चट्टी से चले। अब लगातार ढलान और उतराई थी इसलिए चलने की गति स्वाभाविक रुप से बढ गई थी। बीच में मैखम्बा नामक स्थान पार करते हुए 12.20 पर नानू पंहुच गए। यहां मेरे साथी रुके हुए थे,इसलिए रुक कर डायरी लिख ली।
इस वक्त 12.54 हो रहे हैं और अब यहां से चलने की तैयारी है।
19 जुलाई (शाम 5.00 बजे)
होम स्टे गौण्डार
दोपहर में हम नानू में पराठा खा रहे थे और 12.55 पर वहां से चले थे। नानू से खड्डरा होते हुए हम दोपहर 3.00 बजे वनतोली पंहुच गए। वनतोली गांव दो हिस्सों में बंटा है। एक हिस्सा उपरी पहाडी पर है,दूसरा हिस्सा पहाडी उतरकर है। वनतोली में पंहुचकर हमने राजमा की सब्जी और दो रोटी का भोजन किया। साढे तीन बजे वनतोली से चलना शुरु किया।
हमने तय किया था कि आज हम गौण्डार ही रुकेंगे। वैसे चाहते तो यहां से 5 किमी और चलकर सीधे वहीं अगलोती धार पंहुच जाते,जहां हमारी गाडी खडी है। लेकिन तय किया था कि शाम को गौण्डार में ही रुकेंगे। ताकि हमें आज 5 किमी कम चलना पडे और हम कम थके,क्योंकि हमें अभी रुद्रनाथ की चढाई भी करना है,इसलिए अपनी ऊर्जा बचाकर रखना जरुरी है।
कुल मिलाकर मध्यमहेश्वर की यात्रा लगभग पूर्ण हो चुकी है। यात्रा के दौरान नोट करने वाली बात यह थी कि देश भर के अलग अलग हिस्सों के युवा और सिर्फ लडके ही नहीं मार्डन लडकियां भी यात्रा करती हुई नजर आई। यहां आमतौर पर खच्चर आदि नजर नहीं आए,लेकिन आज उतरते समय कुछ यात्री खच्चरों पर जाते हुए नजर आए।
मध्यमहेश्वर का ट्रैक,वैसे तो कठिन चढाई वाला ट्रेक है,लेकिन पूरा रास्ता बना हुआ है,इसलिए इसमें खतरा बिलकुल नहीं है। बस शरीर की तैयारी होना चाहिए,ताकि आप खडी चढाई वाला रास्ते पर एक दिन में दस बारह किमी चल सके।
हमने कल भी 12.5 किमी का ट्रैक किया था और आज भी 12.5 किमी की यात्रा की है।कल 5 किमी चल कर यह यात्रा पूरी हो जाएगी और फिर हम रुद्रनाथ के लिए रवाना हो जाएंगे।
आज की यात्रा की एक खास बात यह रही कि नवाल सा. के जूते जवाब दे गए। उनके एक जूते का सोल निकल गया,दूसरे का निकलने के लिए तैयार था। अब अगली यात्रा के लिए उन्हे नए जूते लेना पडेंगे।
19 जुलाई 2026 (रात20.07)
नंदीकुण्ड होम स्टे गौण्डार
इस वक्त मेरे सभी साथी भोजन का इंतजार कर रहे हैं। आर्डर दे चुके है,जैसे ही भोजन तैयार होगा,आवाज लगाई जाएगी।
यहां इस होम स्टे में आने के बाद मैने देखा कि बाथरुम में गीजर लगा हुआ है। अण्डर गारमेन्ट्स बदलने की स्थिति नहीं थी,लेकिन दो दिन से नहाए नहीं थे। इन दो दिनों में दर्जनों बार पसीने से पूरे भीगे थे। मुझे लगा कि गरम पानी से स्नान करके कम से कम शरीर थोडा पसीने से मुक्त हो जाएगा। बदलने के लिए अभी धुली हुई अण्डर वियर नहीं थी,इसलिए सोचा कि यही वाली वापस पहन लेंगे,लेकिन कम से कम शरीर से पसीना तो धुल जएगा। मैने स्नान का मूड बनाया तो नवाल सा. ने ठण्डे पानी से ही स्नान कर लिया। फिर मैने गर्म पानी से स्नान किया और वही कपडे वापस पहन लिए। स्नान से बडी राहत मिली। फिर दशरथ जी ने भी स्नान कर लिया,लेकिन पंवार सा. नहीं नहाए।
स्नान वान करके सांध्यकालीन चर्चा में जुटे। अब भोजन का इंतजार है। मुझे भोजन नहीं करना है। मै तो बस सोने ही वाला हूं। अब सोने का समय है। सुबह जल्दी उठकर निकलने की योजना है। देखते है क्या होता है...?
20 जुलाई 26 सोमवार (सुबह 7.15)
नंदीकुण्ड होम स्टे गौण्डार
रात को योजनाएं तो ये बनाई थी कि सुबह 6.00 बजे तक यहां से निकल पडेंगे। रात को 9.30-10.00 तक बिस्तर के हवाले भी हो गए थे, लेकिन सोने के बाद और उससे भी ज्यादा उठने के बाद पता चला कि लगातार चलने का क्या असर हुआ है। सुबह कोई भी जल्दी नहीं उठ पाया और जब नींद खुली तो पूरा शरीर दुख रहा था। हाथ,पैर,जांघे,पिण्डलिया,कमर,पीठ कोई ऐसी नहीं थी,जहां दर्द महसूस ना हो रहा हो।
लगभग सभी की यही हालत है। मैने कहा कि हम दो केदार तो कर ही चुके है,रुद्रेश्वर को अगली बार के लिए छोड भी सकते है,तो नवाल सा. और पंवार सा. की बांछे खिल गई। वैसे तो मैं भी इसी मत का था कि रुद्रेश्वर को ड्राप कर सकते हैं। लेकिन दशरथ जी जाना चाहते थे। अभी आगे देखते है कि इसमें क्या निर्णय होता है।
फिलहाल हम तैयार होकर यहां से निकलने की तैयारी में है।
20 जुलाई 26 सोमवार (रात9.00)
---- होटल (रुद्रनाथ-बद्रीनाथ हाई वे,हेलंग से पहले)
इस वक्त हम लोग हेलंग से पहले हाईवे के इस होटल में रुके हैं। साथियों का भोजन भी हो चुका है। अब सोने की तैयारी है और मैं डायरी के साथ हूं।
अब कहानी वहां से,सुबह जहां छोडी थी।
--- गौण्डार से हम लोग सुबह 8.30 पर निकल पाए। डायरी लिख रहा था कि तभी खबर मिली कि नाश्ते के पराठे तैयार है। पराठे खाकर निकलते निकलते 8.30 हो गए।
गौण्डार से निकलते ही पहले कुछ प्लेन चलकर पहाड पर चढना होता है। फि ्र ढलान आती है,जो मधुगंगा के सहायक नाले तक ले जाती है। गौण्डार से अगतोली धार वैसे तो मात्र 5 किमी है,लेकिन ये 5 किमी भी हमें भारी पड रहे थे। सुबह उठते ही हर व्यक्ति का शरीर जवाब दे रहा था।
गौण्डार से निकल कर करीब 1 घण्टे में उस नाले ततक पंहुचे,जिसे हमने लकडी के पट्टों पर चलकर पार किया था। अब इस स्थान पर पट्टों की जगह लकडी का पुल बनाया जा रहा था। पीडब्ल्यूडी के कर्मचारी,लकडी के पट्टे काट कर पुल बनाया जा रहा था। यहां से जाते समय पंवार सा. ने लौटते वक्त यहां स्नान की इच्छा जताई थी। अब लौटते वक्त,इस कांच जैसे साफ स्वच्छ पानी में नहाना तो बनता था। मेरे पास तो अण्डर गारमेन्ट्स भी नहीं थे,लेकिन मैने तय कि बिना अण्डर वियर के खाली अपना बरमुण्डा पहन लुंगा। तो मैं,पंवार सा. और दशरथ जी इस बर्फ जैसे ठण्डे पानी में नहीए। पसीने से हम पहले ही नहाए हुए थे। इस पानी में स्नान करके नई ताजगी महसूस हो गई।
यहां से नहाकर आगे बढे। अब पहले तो खडी चढाई चढ कर पहाड पर चढना था और फिर इस पहाड को पार करके अपनी गाडी तक पंहुचने के लिए पहाड उतरना था। पहाड चढने के बाद का रास्ता आसान था,लेकिन थकाने वाला तो था ही। पसीने से फिर से टी शर्ट पूरी तरह भीग गया।
इसी रास्ते में चलते चलते यह तय हो गया कि अब हम रुद्रनाथ का ट्रेैक नहीं करेंगे। रास्ते में कई स्थानों पर पहाड धंसा हुआ था और रास्ता खत्म हो चुका था। यात्रियों ने धंसे हुए पहाडों पर चलकर नया रास्ता बनाया था,जो कि बहुत खतरनाक था। पता चला कि बीती रात तेज बारिश हुई थी,जिसकी वजह से ये लैण्ड स्लाइड हुई थी। हमें अंदाजा लग गया कि रुद्रनाथ ट्रैक पर भी यही हालात होंगे। थके हुए तो थे ही,रुद्रनाथ के ट्रैक को हमने अगले साल के लिए आगे बढा दिया।
जिस नाले पर नहाने रुके थे,वहां दशरथ जी से तीन लडके टकरा गए।
दिल्ली के ये लडके मध्यमहेश्वर के दर्शन करके लौट रहे थे।इनकी समस्या यह थी कि ये 6 व्यक्ति दिल्ली से कार से आए थे,लेकिन इनके तीन साथी,बिना दर्शन किए,गौण्डार से ही वापस लौट गए थे। इन तीनों को छोड गए और गाडी लेकर रवाना हो गए।
दशरथ जी ने इन तीनों को रांसी गांव तक छोडने का वादा भी कर लिया। चलते चलते आखिरकार हम 10.30 पर अपनी गाडी पर पंहुच गए। हम जाते वक्त अपने गीले कपडे गाडी में फैला गए थे। आए,तो सारे कपडे सूखे मिले। मैने तुरंत अम्डर वियर और बनियान पहनने का फैसला किया। मेरा ट्रेक पैन्ट भी सूख चुकी थी,वह भी पहनी। पसीने से गीले हो चुके टीशर्ट को बैग में डाल कर बडे बैग में से नया धुला हुआ टी शर्ट निकाला और पहन लिया। गाडी के सामान को नए सिरे से,इस तरह व्यवस्थित किया कि उन तीनों लडकों की भी जगल बन जाए। उन्हे गाडी में बैठाया। वे पहले तो रांसी तक ही जाना चाहते थे,फिर उन्होने कहा कि हम उन्हे उखीमठ तक लिफ्ट देदें,ताकि उन्हे जल्दी से दिल्ली जाने के लिए बस मिल जाए।
इन तीनों लडकों से परिचय करके बाते करते हुए 12.30 तक उखीमठ पंहुच गए। तीन लडकों में से एक कार का ड्राइवर था,जो ओला के लिए गाडी चलाता था। बाकी के दो चोलामण्डलम के रिकवरी एजेन्ट थे। इन तीनों को उखीमठ छोडकर हम कल्पेश्वर के लिए आगे बढ गए।
कल्पेश्वर का रास्ता,रुद्रप्रयाग के बाहर से पलटता है। रुद्रप्रयाग तक हमे जाना ही था। रुद्रप्रयाग शहर के बाहर से ही हमने बद्रीनाथ हाईवे पकड लिया। दोपहर करीब 2.00 बजे एक होटल में रुक कर रतलामी सेव की सब्जी बनवाई और बेहतरीन भोजन किया।
वहां से चले। गूगल मैप,कल्पेश्वर पंहुचने का समय शाम 7.30 बता रहा था। हमने पहले ही तय कर लिया था कि इससे पहले ही 6.00 बजे के आसपास होटल देखकर रुक जाएंगे। हेलंग से पहले इस होटल में 4 बेडेड रुम लेकर हम रुक चुके हैं। इस समय बारिश के कारण टूरिस्ट ना के बराबर है। सारे होटल खाली पडे हैं। हम इस होटल में सैटल हुए।
अब भोजन हो चुका है। दो साथी सौ चुके हैं। दशरथ जी भी सोने की तैयारी में है। मैं डायरी लिख रहा हूं। मुझे भी अब सोना ही है।
कल सुबह,यहां से निकल कर हेलंग से रास्ता बदलकर कल्पेश्वर जाएंगे। वहां दर्शन करके,शाम तक या उससे पहले बद्रीनाथ पंहुच जाएंगे। बद्रीनाथ में सुरेश राणे जी मौजूद है,जिनका आग्राह था कि हम उनसे भेंट करके ही जाएं। तो उनसे भी भेंट हो जाएंगी। बद्रीनाथ के दर्शनों के बाद वापसी की यात्रा शुरु करेंगे।
(अगला भाग पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करे)
No comments:
Post a Comment