Saturday, August 22, 2026

पंच केदार यात्रा -4 / कल्पेश्वर महादेव और कल्प गंगा के दर्शन

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21 जुलाई 2026 मंगलवार (शाम 7.25)

बद्रीश कैलाशम होटल,बद्रीनाथ धाम


इस वक्त हम लोग बद्रीनाथ के तप्त कुण्ड में स्नान करके,श्री बद्री विशाल के दर्शन करने के बाद इस होटल में आराम कर रहे हैं।


बात आज सुबह से,सुबह सभी बडे आराम से उठे थे। करीब 6.30 पर सभी लोगों की नींद खुल चुकी थी। बडे आराम से नहाते धोते हम करीब 8.30 पर होटल से निकले। हमने नाश्ता किसी अन्य होटल में करने का सोचा था। कुछ ही दूरी पर एक होटल में रुके तो उसने नाश्ते में पराठे के अलावा पोहे का जिक्र किया।  रतलाम के लोगों को उत्तराखण्ड में पोहे मिल जाए तो क्या कहना? लेकिन ये लालच बहुत महंगा पडा।


3 प्लेट पोहे का आर्डर दिया। पोहे में होटल वाला सेव डाल रहा था,तो हमने कहा कि सेव हम अपनी ही रतलामी सेव डालेंगे। पोहे कुल मिलाकर स्वादिष्ट थे और इसकी मात्रा भी बहुत ज्यादा,रतलाम से लगभग दोगुनी थी। पोहे खाए,मजा भी आया,लेकिन ये मजा तब काफूर हो गया,जब बिल सामने आया। पोहे की एक प्लेट की कीमत सौ रु. लगाई गई थी,जिसमें सेव हमारी थी। खैर ये झटका खाकर आगे बढे। 


हमें जाना था,कल्पेश्वर। कल्पेश्वर का रास्ता उर्गम से कटता है। उर्गम यहां से करीब 20 किमी दूर बद्रीनाथ हाईवे पर ही था। उरगम से बाई ओर कल्पेश्वर महादेव का रास्ता कटता है। जैसे ही उरगम के लिए टर्न हुए,वहां कल्पेश्वर का एक द्वार बना हुआ था। द्वार पर ही हमें एक व्यक्ति ने बताया कि बीती रात हुई तेज बारिश के कारण कल्पेश्वर से 7 किमी पहले रास्ता कट गया है। वाहन उससे आगे नहीं जा सकते। उसी ने बताया कि जहां रास्ता कटा है,उसके दूसरी ओर लोकल वाहन मिल जाएंगे,जो कल्पेश्वर ले जाएंगे।


हम चल पडे। कल्पेश्वर की दूरी इस मोड से करीब बीस किमी थी। यानी 13 किमी के बाद रास्ता बन्द था। ये 13 किमी का रास्ता भी बेहद खतरनाक,कच्चा और संकरा था। कच्चे रास्ते,खडी चढाई पर 180 डिग्री के मोड और जगह जगहरेड धंसा हुआ भी था।  करीब एक घण्टे में 13 किमी की दूरी पार हुई। जिस जगह रास्ता टूटा था,वहां जेसीबी मशीन की मदद से रास्ते को फिर से बनाने की मशक्कत चल रही थी।


हमने कार को यहीं लाक करके पैदल टूटा रास्ता पार किया और दूसरी तरफ एक मारुति 800 गाडी तय की जो 600 रु. में दर्शन करवाकर वापस लाने को राजी था। ड्राइवर का नाम था रामचन्द्र कोठियाल। रामचन्द्र अच्छा बातूनी आदमी था। टैक्सी भी चलाता था और ट्रैक्र्स के लिए गाइड का काम भी करता था। बातों बातों में उसने बताया कि यहां कल्पेश्वर महादेव से सीधे उपर उपर रुद्रनाथ जाया जा सकता है और यह रास्ता करीब दस किमी का पडता है। हमने उससे कहा कि अगली बार रुद्रनाथ यात्रा के लिए यहीं से ट्रैक करेंगे और रामचन्द्र कौठियाल को ही गाइड बनाएंगे।


बातें करते करते पहले उरगम गांव आया। असल में यह एक घाटी है,जिसे उर्गम घाटी ही कहा जाता है। सबसे पहले उर्गम गांव,उससे आगे देवग्राम। इसी घाटी में दो-चार गांव और भी है। कल्पेश्वर देवग्राम में हैं। 


हमारी गाडी कल्पेश्वर महादेव पर पंहुची। गाडी से उतरते ही मन प्रसन्न हो गया। सामने ही एक अत्यन्त मनमोहक विशाल झरना गिर रहा था। सामने विकराल तेज गति से नदी बह रही थी। यह नगी कल्प गंगा कहलाती है। कल्पगंगा को पार करने के लिए पुल बना है। छोटा सा पुल पार करते ही दाई ओर उपर जाने की सीढियां हैं। ये सीढियां चढते ही कल्पेश्वर महादेव का प्रवेश द्वार नजर आता है।


प्रवेश द्वार से भीतर जाते ही,दार्ई ओर पहाड में सबसे पहले द्वादश ज्योतिर्लिंग के प्रतीक शिवलिंग स्थापित है। द्वादश ज्योतिर्लिंग के आगे पंच केदार के शिवलिंग है। इनमें केदारनाथ तो हूबहू केदारनाथ जैसा शिवलिंग है। 


दार्ईं ओर ये सभी कतार में स्थापित है। आगे बढने पर छोटा सा अहाता है और दूसरी ओर छोटा सा दरवाजा है। ऐसा लगता है,जैसे इस दरवाजे के आगे गुफा है। इसी गुफा में भगवान कल्पेश्वर विराजित है। दरवाजे में झुक कर प्रवेश करना पडता है। गुफा में प्रवेश करते ही दाई ओर कल्पेश्वर महादेव का शिवलिंग है।


अभी तक हमने पंच केदार में से जिन स्थानों पर दर्शन किए,उनमें तुंगनाथ में शिवलिंग पर जल चढाने की सुविधा थी,लेकिन मध्यमहेश्वर में तो गर्भगृह में प्रवेश ही नहीं दिया जा रहा था।लेकिन यहां दर्शन करने में आनन्द आ गया। पण्डित जी ने सभी को चंदन का तिलक लगाया। शिवलिंग का जलाभिषेक भी करवाया। शिवलिंग को सिर छुआकर आशीर्वाद भी प्राप्त किया। 


बाहर निकले तो मन्दिर की व्यवस्था सम्हाल रहे श्री नेगी जी ने कल्पेश्वर का इतिहास बताया। उन्होने बताया कि कल्पेश्वर महादेव पंच केदार में पांचवे केदार है। ये शिव की जटाओं का स्वरुप है। सभी पंच केदार मन्दिरों की स्थापना पाण्डवों ने की थी। यहां मध्यमहेश्वर में शिव जी के जटास्वरुप शिवलिंग से  लगातार पानी टपकता है,जो पीछे एक कुण्ड में एकत्रित होता है और इसी पानी से यह कल्पगंगा नदी बह रही है। कल्पगंगा नदीं मंदिर के बाई ओर नीचे की ओर बह रही है। नदी की तेज धाराओं का शोर तेज आवाज में सुनाई दे रहा था।


मंदिर से बाहर आकर झरने के नजदीक गए। बहुत उंचाई से गिर रहे इस झरने का पानी एक कुण्ड में एकत्रित होता है,और फिर कुण्ड से यह पानी कल्पगंगा में मिल जाता है। झरने पर कई सारे फोटो विडीयो बनाए। झरने के आसपास के इलाके में पानी की फुहारें रिमझिम बारिश का एहसास कराती है। अब यहां से लौटे। फिर से टैक्सी में सवार होकर टूटी सडक़ पार करके अपनी गाडी में सवार हुए। 


अब हम चल पडे,बद्रीनाथ के लिए। उरगम घाटी का कच्चा रास्ता पार करके बद्रीनाथ हाईवे पर आए। बद्रीनाथ हाईवे काफी अच्छा और चौडा हो गया है। उरगम से कुछ ही आगे जोशीमठ था। जोशीमठ को पार करके आगे बढे। गोविन्द घाट से कुछ पहले करीब 2.00 बजे भोजनके लिए एक होटल पर रुके। भोजन करके आगे बढे। गोविन्द घाट के बाद तो बद्रीनाथ हाईवे की चढाई और भी खडी हो जाती है,लेकिन मोदी जी के चारधाम प्रोजेक्ट के कारण सडक़ काफी चौडी हो चुकी है,इसलिए तेज गति से वाहन चल पाते हैं।


हांलाकि इस रोड पर निरन्तर लैण्डस्लाइड की समस्याएं है,इसलिए बीच में कहीं कहीं सडक़ कच्ची भी है।


बद्रीनाथ में हमें बद्रीनाथ के दर्शनों के अलावा होशंगाबाद के पुराने ट्रैकर सुरेश राणे जी से भी मिलना था। सुरेश राणे जी पुराने ट्रैकर रहे हैं और लगभग पूरा हिमालय ट्रेकिंग करके छान चुके हैं। उन्हे जब सोशल मीडीया पर हमारे पंच केदार प्रोग्राम का पता चला तो उनका फोन दशरथ जी के पास आया कि वे एक महीने से बद्रीनाथ में ही हैं। उन्होने बताया कि बद्रीनाथ कल्पेश्वर के बुहत पास है,इसलिए कल्पेश्वर दर्शन के बाद हमें बद्रीनाथ जाकर उनसे भी मिलना चाहिए।


सुरेश राणे जी से परिचय की कहानी भी रोचक है। उन्होने सोशल मीडीया या यूट्यूब पर हमारी सतोपंत ट्रैकिंग का विडीयो देखा था और फिर उन्होने दशरथ जी का नम्बर लेकर उनसे बात की थी। इसके बाद पचमढी यात्रा के दौरान उनका फोन आया था कि वे होशंगाबाद में ही है,इसलिए पचमढी से लौटते वक्त उनसे मिलकर जाना होगा।


हम लोगों ने होशंगाबाद में उनसे भेंट की थी। उनकी पढाई रतलाम में ही हुई। रतलाम में वे संघ कार्य भी करते रहे थे। आपातकाल में जेल में भी रहे। रतलाम में संघ के अनेक पुराने लोगों से उनके नजदीकी सम्बन्ध है। इसके अलावा उनका ट्रेकिंग का शौक भी था,जिसकी वजह से उन्होने हमें याद किया था।


संघ के एक प्रचारक जी उनके मित्र थे,जो कि सन्यासी हो गए और वर्तमान में गुवाहाटी में उनका आश्रम है। वे ही महाराज जी यहां बद्रीनाथ में एक नया आश्रम बनवा रहे है। चूंकि राणे जी सिविल इंजीनियर है,इसलिए आश्रम निर्माण पर नजर और नियंत्रण रखने के लिए वे यहां रुके हैं। महाराज जी का एक छोटा आश्रम बद्रीनाथ में पहले से है,जहां राणे जी रहते है।


हम करीब 4.00 बजे बद्रीनाथ पंहुच गए। आते ही इस होटल में कमरा तय किया। सामान टिकाया और राणेजी को फोन किया। उन्होने बताया कि वे मन्दिर क्षेत्र में ही है। हम भी सबसे पहले तप्त कुण्ड में स्नान करके भगवान के दर्शन करना चाहते थे। सभी लोग मन्दिर पंहुेचे। तप्त कुण्ड में स्नान करने पंहुचे। पानी बहुत गर्म था। कई प्रयासों के बाद भी कुण्ड में उतर कर स्नान नहीं कर पाए। बाल्टी मग से कुण्ड के बाहर बैठकर ही स्नान करना पडा। तभी राणे जी भी मिल गए। तप्त कुण्ड के समीप ही सुन्दरकाण्ड का पाठ हो रहा था और राणे जी भी वहीं थे। 


हम स्नान करके बाहर निकले कि तभी सुन्दरकाण्ड़ समाप्त होकर आरती होने लगी। हमने भी आरती में हिस्सा लिया और फिर सीढियां चढकर मन्दिर में ंपहुच गए। इस वक्त बद्रीनाथ जी में श्रध्दालुओं की संख्या बेहद कम है। दर्शन बडी आसानी से बिना लाइन में लगे हो रहे हैं।


हमने आराम से दो बार दर्शन किए। प्रसाद लिया। फिर राणे जी हमें उनका आश्रम दिखाने ले गए। बद्रीनाथ मन्दिर से राणे जी के आश्रम के लिए चले तो पता चला कि उनका आश्रम बहुत दूर था। राणे जी पहले तो हमें वह स्थान दिखाने ले गए,जहां वे नए आश्रम का निर्माण करवा रहे थे। वहां तक तो नवाल सा. और पंवार सा. भी हमारे साथ आए थे,लेकिन वहां से वे दोनो होटल के लिए लौट गए। हम राणे जी के साथ आगे उनके आश्रम तक गए जहां वे इस वक्त रुके हुए थे। 


रास्ते में राणे जी ने बताया कि वे दो-तीन महीनों में 70 के हो जाएंगे। उन्होने हमें यह सलाह दी कि हमें फूलों की घाटी देखते हुए ही जाना चाहिए,क्योकि यही सीजन है,जब फूलों की घाटी में भरपूर फूल नजर आते हैं। मैं जानता था कि फूलों की घाटी जाना कितना कठिन है।


गोविन्दघाट से 11 किमी पैदल चलकर पहले घांघरिया पंहुचों फिर वहां से हेमकुण्ड साहिब के रास्ते पर 3.50 किमी चलों,जहां से फूलों की घाटी का रास्ता कटता है। फिर वहां से 2 किमी खडी चढाई चढने के बाद फूलों की घाटी शुरु होती है,जो कि करीब 11 किमी में फैली है। हममें से किसी की भी अब ऐसी हालत नहीं थी कि 2-4 किमी भी ट्रैक कर पाए। खैर,उनकी बातें सुनते रहे। बातें करते हुए उनके आश्रम पर पंहुचे। आश्रम के संत कृष्णदास जी ने हमें चाय बनाकर पिलाई। कृष्णदास जी गुवाहाटी के निवासी है,और राणेजी के मित्र संत महाराज के शिष्य है। जब तक बद्रीनाथ के पट बन्द नहीं होते वे यहीं रहते है,फिर गुवाहाटी चले जाते है और फिर गुरुजी जहां भेज देते है,वहां चले जाते हैं। लेकिन जिन दिनों में बद्रीनाथ के पट खुले रहते है,वे यहीं रहते हैं।


आश्रम पर चाय पीने के बाद हमने राणे जी से बिदा ली। हमने बताया कि सुबह दर्शन के बाद हम निकल जाएंगे। कृष्णदास जी ने कहा कि अगर आप थोडी देर रुकते हो तो दोपहर का भोजन यहीं करना। हमने विनम्रता से इंकार कर दिया। 


फिर हम होटल लौटे। पंवार सा.और नवाल सा. पहले ही होटल में आ चुके थे। कमरे में आए। 8.00 बज चुके थे। अब ठण्ड महसूस होने लगी थी। मैने इनर पहन लिया। डायरी के साथ जुड गया। रात 9.00 बजे डीडी न्यूज पर डिकोड प्रोग्राम देखा।


अब सोने की तैयारी। कल सुबह एक बार फिर तप्त कुण्ड पर स्नान करके भगवान के दर्शन करेंगे और यहां से वापसी की यात्रा शुरु करेंगे।  


शुभ रात्रि......। (रात11.00)

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