Saturday, December 27, 2025

नेपाल यात्रा-7 पशुपतिनाथ के दर्शनों के साथ नेपाल से वापसी

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16 नवंबर 2024


विश्व विख्यात पशुपतिनाथ मन्दिर होटल के बिलकुल सामने ही था। सुबह सवेरे जल्दी उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर मन्दिर के दर्शनों के लिए चले। 


अद्भुत और विशाल मन्दिर। लेकिन मन्दिर में उतनी भीड नहीं थी,जितनी आशंका थी। दर्शनार्थी थे तो बडी संख्या में,दर्शनों के लिए कतार भी लगी हुई थी,लेकिन दर्शन करने में अधिक समय नहीं लगा। 


मन्दिर के पीछे ही गण्डकी नदी बहती है। यहीं एक स्थान पर श्मशान भी है,जहां मृतकों की अंतिम क्रिया चल रही थी। मन्दिर में कई स्थानों पर हवन पूजन,मंत्रोच्चार और भजन कीर्तन चल रहे थे। काफी देर इन चीजों का आनन्द लेने के बाद यहां से निकले। 


काठमाण्डू से करीब तीस किमी दूर एक कस्बे में स्थानीय साहित्यकारों ने भारतीय साहित्यकारों के आगमन के उपलक्ष्य में मिलन समारोह आयोजित किया था। हमें वहां पंहुचना था। वहां पंहुचकर साहित्यिक आयोजन में शामिल हुए।


आयोजन में जहां नेपाली साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया,वहीं भारत से गए हुए साहित्यकारों ने भी अपनी कृतियों का पाठ किया। लेखकों ने एक दूसरे को अपनी प्रकाशित पुस्तकें  भेंट की. करीब दो घण्टे के आयोजन के बाद वहां से लौटे। 


शाम को काठमाण्डू में ही हमारे यात्रा आयोजकों के एक और मित्र समूह के साथ सांध्यकालीन भोजन और साहित्य चर्चा का कार्यक्रम था। कथित रुप से एक प्रसिध्द थकाली रेस्टोरेन्ट में आयोजित इस कार्यक्रम में हमारे सभी सहयात्रियों ने भोजन का आनन्द लिया और होटल लौटे। 


नेपाल यात्रा अब अपने समापन की ओर थी। अगली सुबह हमें काठमाण्डू से भारत के लिए यानी काकरभिट्टा बार्डर के लिए रवाना होना है।


17 नवंबर 


काठमाण्डू से सुबह जल्दी निकलने का इरादा था,लेकिन हमारी यात्रा आयोजक रीता सिंह जी सुबह एक बार और पशुपतिनाथ महादेव के दर्शन करना चाहती थी। वैदेही भी उनके साथ जल्दी उठकर दर्शन के लिए पंहुच गई थी।


इस दौरान मैं तैयार हुआ और अब सभी लोग काठमाण्डू से वापसी के लिए तैयार थे। काठमाण्डू से काकरभिट्टा बार्डर करीब साढे चार सौ किमी दूर है। गुगल मैप के मुताबिक इतनी दूरी पार करने के लिए यदि बिना रुके भी चले तो साढे ग्यारह घण्टे लगने थे,जबकि हम लोगों को रास्ते में भोजन नाश्ता इत्यादि भी करना था। 


खैर अब वापसी का सफर शुरु हुआ। नेपाल के उबड खाबड रास्तो पर चलते हुए हमारा सफर आधी रात तक चलता रहा। रात करीब एक बजे हमारी गाडी काकरभिट्टा बार्डर पर पंहुची।


वहां पंहुचकर याद आया कि भारत नेपाल बार्डर पर सूर्यास्त के बाद आवागमन बन्द हो जाता है। बार्डर के गेट बन्द हो चुके थे और अब सुबह तक बार्डर पार नहीं की जा सकती थी। हमारी महिला यात्रियों ने वहां तैनात नेपाली सुरक्षाकर्मियों से काफी अनुनय विनय की,लेकिन वे टस से मस नहीं हुए। महिलाओं ने नेपाली भाषा में उन्हे समझाने की कोशिश की,कि गाडी में अधिकांश महिलाएं है,रात भर वे क्या करेंगी? उनका टका सा जवाब था कि गाडी में ही रात काटो या आस पास के किसी होटल में चले जाओ।


मजेदार बात यह है कि रीता सिंह जी ने सिलीगुडी में वहीं होटल फिर से बुक करके रखा था,जहां पहली रात हम रुके थे। लेकिन अब हम उस होटल पर तो जा ही नहीं सकते थे। इस वक्त रात के करीब डेढ बज चुके थे और अब पूरी रात काटने की चुनौती थी। इसी बीच रीता जी को अचानक काकरभिट्टा के एक होटल व्यवसायी का ख्याल आया। उसका नम्बर भी उनके पास मौजूद था। उस होटल में पंहुचे और होटल व्यवसायी को फोन लगाया। किस्मत अच्छी थी कि रात डेढ बजे उसने फोन भी उठा लिया और कमरे भी देने को राजी हो गया। 


कमरों में पंहुचे तब तक दो बज चुके थे और सुबद छ: बजे यहां से निकलना था,क्योकि अरुणाचल से आई गुम्फी जी की फ्लाइट सिलीगुडी से सुबह नौ बजे थी। उन्हे सही समय पर एयर पोर्ट पर पंहुचाना था। 


18 नवंबर

सुबह छ: बजे काकरभिट्टा से निकले और सीधे सिलीगुडी एयरपोर्ट पर पंहुचे। गुम्फी जी को सही समय पर एयरपोर्ट पर छोड दिया गया। हमारी ट्रेन न्यू जलपाई गुडी से रात आट बजे थी और रिजर्वेशन कन्फर्म हो चुका था,इसलिए कोई तनाव नहीं था। 


सिलीगुडी में एक होटल में दो रुम लिए। अब हम सिर्फ पांच लोग बचे थे। मै और वैदेही,तुमुल जी,रीता जी और उनकी बहन। तीनों महिलाएं सिलीगुडी बाजार में खरीददारी करना चाहती थी और कुछ परिचितों से भी मिलना चाहती थी। इसलिए होटल में स्नान इत्यादि से निवृत्त होकर तीनों महिलाएं वहां से रवाना हो गई। अब बचे हम दो मैं और तुमुल सिन्हा जी। हमने अपना वक्त चर्चाओं में गुजारा। कुछ आराम किया। तुमुल जी की ट्रेन अगली सुबह थी। 


शाम को तुमुल जी हमे स्टेशन पर छोडने आए और ट्रेन सही समय पर न्यू जलपाईगुडी पंहुच गई। हम ट्रेन में सवार हुए और एक लम्बा सफर काट कर सीधे रतलाम पंहुच गए।


समाप्त।

नेपाल यात्रा-6 विन्ध्य वासिनी के दर्शनों के बाद पशुपतिनाथ की ओर

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15 नवंबर-

पोखरा का दूसरा दिन। आज हमें विन्ध्य वासिनी देवी के दर्शन करके काठमाण्डू पंहुचना था। सुबह जल्दी उठकर निकलने की योजना थी। करीब नौ बजे होटल से निकले। विन्ध्य वासिनी पोखरा का प्रसिध्द धर्मस्थल है। एक विन्ध्य वासिनी हमारे मध्यप्रदेश में मैहर माता के रुप में मौजूद है,दूसरी यहां है।


विन्ध्यवासिनी देवी के दर्शन किए । यहां विडीयो भी बनाए। यहां एक टावर बनाकर व्यू पाइन्ट बनाया गया है,जहां से नेपाल की कई प्रसिध्द पर्वत चोटियां नजर आती है। मौसम साफ था इसलिए हमें भी यहां से माछा पूच्छा चोटी नजर आ गई थी। माछा पूच्छा यानी मछली की पूछ जैसी। यह चोटी इसी आकार की है।


हमारे साथ चितवन से आई ऊषा तिवारी जी को यहीं से वापस लौटना था। देवी दर्शन के बाद यहां से निकले। ऊषा जी मोंगलिंग तक हमारे साथ ही जाने वाली थी। सुबह देवी दर्शन के बाद उनके रिश्तेदार के होटल में ही नाश्ता भोजन किया था और पोखरा से रवाना हो गए थे। 


गाडी के सभी यात्री साहसी यात्री थे। इनोवा में हम कुल नौ लोग फंसे हुए थे।  यात्रा आयोजन रीता सिंह जी,उनकी बहिन पूजा और सहेली ऊषा तिवारी। अरुणाचल से आई गुम्फी जी और उनका बेटा लिदिन। तुमुल जी,वैदेही और ड्राइवर प्रदीप पाल। नेपाल के जर्जर पहाडी रास्तों पर इस तरह से फंस फंसा कर साहसी लोग ही यात्रा कर सकते हैं।


पोखरा से बढे। दोपहर करीब दो बजे मोंगलिंग पंहुचे। जहां सभी ने दोपहर का भोजन किया,मेरे अलावा। नेपाल के टूटे फूटे महेन्द्र राजमार्ग पर चलते हुए हम शाम करीब छ: बजे काठमाण्डू के हमारे होटल रामेश्वरम पंहुच गए। नेपाल में अंधेरा साढे पांच बजे ही हो जाता है। होटल के कमरे में पंहुचे। अभी कहीं आने जाने का इरादा नहीं था। पशुपतिनाथ के दर्शन करने के लिए सुबह छ: बजे नहा धोकर जाना था। मन्दिर होटल के सामने ही सडक़ के दूसरी तरफ था। 


रात्रिकालीन चर्चा के बाद इस दिन का समापन हुआ।

नेपाल यात्रा-5 पोखरा की फेवा झील के साथ चमत्कारिक गुप्तेश्वर महादेव के दर्शन

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18 नवंबर 24 सोमवार (रात 8.00 बजे)

गौहाटी ओखा द्वारका एक्सप्रेस (कोच बी-

2-17,18


हमारी ट्रेन अब हमारे घर की दिशा में तेजी से दौड रही है और 20 नवंबर की सुबह हम रतलाम में होंगे। पूरे सफर में ट्रेन के डिब्बे में ही सबसे ज्यादा खाली वक्त मिल रहा है। शायद ये ऐसी पहली यात्रा थी,जिसमें डायरी बहुत कम लिख पाया। बेहद अस्तव्यस्त यात्रा के चलते डायरी लिखने के लिए पर्याप्त समय ही नहीं मिल पाया। इसलिए अब ट्रेन में चलने के दौरान ही सबकुछ लिखना है।


14 नवंबर 24

जिस समय डायरी छूटी थी,उस वक्त में पोखरा भ्रमण की कथा कह रहा था। सूर्योदय देखने की असफल कोशिश और बेवजह तीन घण्टे खराब होने के बाद हम करीब दस बजे होटल वापस लौटे थे। हमारी होस्ट रीता जी और ऊषा जी ने कहा कि हमे बहुत जल्दी निकलना होगा,तभी हम पोखरा घूम सकेंगे। 


लेकिन मैं और तुमुल सिन्हा जी वैसे ही भडके हुए थे,इसलिए हमने कहा कि नहाने धोने में जितना समय लगता है,उतना तो लगेगा ही। हमें तैयार होने में करीब डेढ घण्टा लगा और हम साढे ग्यारह बजे पोखरा घूमने निकल पाए। 


पोखरा में हमारे होटल का नाम सी लेक था। पोखरा में फेवा झील बहुत प्रसिध्द झील है और हमारा होटल झील के बिलकुल नजदीक था,इसलिए होटल का नाम सी लेक था। फेवा लेक पहाडों के बीच बनी हुई बेहद विशाल झील है। फेवा झील करीब 4 किमी लम्बी और करीब 9 किमी चौडी झील है। फेवा झील को पहले बैदाम ताल कहा जाता था। यह झील पोखरा घाटी के दक्षिण में स्थित है और इसमे पोखरा शहर,सारंगकोट और कास्किकोट के कुछ हिस्से शामिल है। यह नेपाल की रारा झील के बाद दूसरी और नेपाल के गण्डकी प्रान्त की सबसे बडी झील है। झील के बीचोबीच में एक छोटे से टापू पर ताल बाराही मन्दिर है,जहां सिर्फ बोट से ही जाया जा सकता है। 

 

चूंकि होटल के सबसे नजदीक फेवा झील थी,इसलिए पोखरा भ्रमण की शुरुआत यहीं से की गई। हम करीब साढे ग्यारह बजे फेवा झील पर पंहुचे। यहां आने वाले पर्यटक बोटिंग का आनन्द लेते है। पैडल बोट भी यहां बडी संख्या में हैं। लेकिन हममे से कोई भी बोटिंग करने का इच्छुक नहीं था,बल्कि बोट से ताल बाराही मन्दिर के दर्शन जरुर सभी करना चाहते थे। बोट से ताल बाराही मन्दिर जाने के लिए सभी यात्रियों को लाइफ जैकेट पहनना होती है। लाइफ जैकेट पहन कर सभी एक बोट में सवार हुए और ताल बाराही मन्दिर के टापू पर जा पंहुचे। इसछोटे से टापू पर शिव जी का मन्दिर है। गणेश जी और हनुमान जी भी यहां स्थापित है। टापू पर पंहुचकर मैने इसका विडीयो बनाया। हमें बताया गया कि इस टापू पर एक बूढी महिला रहती थी। एक रात बहुत तेज बारिश हुई और इस बारिश के दौरान एक महिला बूढी महिला के पास पंहुची और रात गुजारने का आश्रय मांगा। बूढी महिला ने उसे अपनी झोपडी में रात गुजारने के लिए जगह दे दी। वह ताल बाराही देवी थी। उसने बूढी महिला को वरदान दिया कि इस बारिश से आसपास सब कुछ डूब जाएगा,लेकिन ये झोपडी नहीं डूबेगी। तभी से इसके चारो ओर पानी है,लेकिन यह टापू बीच में मौजूद थे। ताल बाराही टापू पर मन्दिरों के दर्शन करके हम वापस किनारे पर लौटे। 

होटल से निकलते वक्त मैने कुछ भी खाया पिया नहीं था। मुझे उम्मीद थी कि जहां जाएंगे वहां कुछ ना कुछ खाने को मिल ही जाएगा। लेकिन झील के किनारे पर खाने के लिए कुछ नहीं मिला। भूख से मेरी हालत खराब होने लगी थी। लेकिन झील से निकल कर चितवन वाली ऊषा जी हमें महेन्द्र गुफा ले गई। महेन्द्र गुफा के बाहर भी कुछ भी खाने पीने को नहीं मिला।


महेन्द्र गुफा जमीन से काफी नीचे एक बहुत विशाल गुफा है,जिसका नाम नेपाल के महाराजा महेन्द्र के नाम पर रखा गया है। नीचे उतरने के बाद गुफा में जब आगे बढते हैं,तो करीब सौ मीटर चलने के बाद दोराहा आ जाता है। बाई ओर का रास्ता अंधेरा है और इसे बन्द किया हुआ है और इसे बेट केव यानी चमगादडों की गुफा कहतै है। कहते हैं कि ये काफी भीतर तक गई है और इसमें आमतौर पर कोई नहीं जाता। लेकिन इसके विपरित दाहिनी ओर आगे बढते हैं,तो गुफा का रास्ता आगे बढते हुए शिवजी के मन्दिर पर जाकर समाप्त होता है।

यहां शिवलिंग और गणेश जी की प्राकृतिक रुप से बनी हुई मूर्तियां विराजित है। यहां एक पण्डित जी भी विराजित थे। इसी स्थान पर पवित्र जल का चमत्कारिक कुण्ड भी है,जिसका पानी कभी समाप्त नहीं होता। मैने गुफा का विडीयो बनाया। पाण्डित जी का इंटरव्यू भी लिया। पण्डित जी ने बताया कि गुफा या तो पानी से बनती है या फिर ज्वालामुखी से। यह गुफा ज्वालामुखी से बनी हुई है। उन्होने कुण्ड का चमत्कारिक जल हम लोगों पर छिडका और चरणामृत की तरह हाथों पर भी दिया। महादेव और गणेश जी के दर्शन कर हम गुफा से बाहर निकले।


घडी अब एक बजे का वक्त दिखा रही थी और मैने सुबह से कुछ भी नहीं खाया था। भूख से मेरी हालत खराब हो रही थी।पोखरा में ऊषा जी के एक रिश्तेदार का रेस्टोरेन्ट था,उन्होने वहीं सभी के नाश्ते की व्यवस्था की थी। हम करीब एक बजे उस होटल में पंहुचे। यहां आलू पराठे बनाए गए थे। मैने तो इसी से अपना भोजन कर लिया। अब दोपहर के सवा दो बज गए थे। 


रीता जी और ऊषा जी ने बताया कि पोखरा का साहित्यिक कार्यक्रम शाम को पांच बजे हैं,इसलिए अब घूमने के लिए हमारे पास मात्र तीन घण्टे है। इसलिए उन्होने हमें देवी फाल दिखाने का प्रस्ताव रखा। हममे से कोई भी पोखरा के बारे में कुछ जानता नहीं था। हमें क्या पता,कहां जाना है? क्या देखना है?,देवी फाल तो देवी फाल ही सही। देवी फाल पंहुचे,यहां के टिकट लिए और भीतर गए तब तक चार बज चुके थे। 


देवी फाल में नदी का पानी बेहद तेज बहाव से गिरता है। हांलाकि झरना ज्यादा उंचाई से नहीं गिरता,लेकिन पानी का बहाव इतना तेज है कि यहां पानी की बूंदे भाप बनकर या धुएं की शक्ल में उडती है। बेहद तेज बहाव में बहता यह पानी थोडा ही आगे जाकर लुप्त हो जाता है। यहां के विडीयो बनाए। इसी दौरान यहां के बोर्ड पर देखा कि गुप्तेश्वर महादेव यहां से मात्र सौ मीटर की दूरी पर है। जो कि एशिया की सबसे प्राचीन और सबसे विशाल गुफा में विराजित है। मैने रीता जी और ऊषा जी को गुप्तेश्वर देखने का प्रस्ताव दिया तो उन्होने कार्यक्रम शुरु होने का हवाला दिया। लेकिन जब मैने उन्हे बताया कि यब बिलकुल नजदीक ही है,तो सब लोग वहां जाने को राजी हो गए। 


पूरी नेपाल यात्रा में सबसे शानदार और जबर्दस्त स्थान यही था। नेपाल सरकार ने इस गुफा के प्रवेश को अत्यन्त सुन्दर बनाया है। टिकट लेने के बाद गुफा के द्वार तक पंहुचने के लिए नीचे उतरती गोलाकार सीढियां बनाई गई है और इसकी दीवार पर देवी देवताओं की सुन्दर मूर्तियां तथा पौराणिक कथाओं जैसे समुद्र मंथन के दृश्यों वाली मूर्तियां लगाई गई हैं। नीचे उतरकर गुफा के द्वार पर पंहुचने के बाद जब गुफा में नीचे उतरते हैं तो सीढियां बनी हुई हैं,जो हमें करीब 50 फीट नीचे ले जाती है। यहां गुप्तेश्वर महादेव का मन्दिर है जो गोलाकार बना हुआ है। यहां कैमरे की मनाही थी,लेकिन मैने जैसे तैसे विडीयो बना ही लिया।


लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती,बल्कि यहां से शुरु होती है। महादेव के मन्दिर से आगे बढते हैं,तो थोडा नीचे उतरकर गुफा का रास्ता शुरु होता है,जो थोडा संकरा है,लेकिन एक व्यक्ति आराम से चल सकता है। गुफा का टेढा मेढा रास्ता करीब 500-700 मीटर लम्बा है और यह एख बेहद विशाल गुफा में पंहुचता है। बहुत ही विशाल गुफा जिसमें हर तरफ पानी टपकता रहता है। गुफा के एक कोने में महादेव और पार्वती माता की आमने सामने बैठी मूर्तियां है। गुफा के भीतर का वातावरण बडा ही डराने वाला है। इसमें हर ओर पानी तो टपक ही रहा है,ठण्ड भी बहुत है साथ ही आक्सिजन भी कम है। 


लेकिन चमत्कार इससे भी आगे है। गुफा में पंहुचने पर नीचे पानी का कुण्ड नजर आता है और इस कुण्ड के नजदीक पंहुचने के लिए लोहे की सीढियां लगाई गई है। करीब सौ सीढियां उतरकर जब पानी के कुण्ड के पास पंहुचते है,तो जाकर पता चलता है कि यहां वही पानी आ रहा है,जो देवी फाल में लुप्त हो गया था।  इस गुफा के आखरी छोर पर देवी फाल भी नजर आने लगता है। इस पूरी गुफा में भी देवी फाल के पानी का धुआं धुआं भरा हुआ है।


देवी फाल देखने के लिए हम सडक़ के दाहिनी ओर गए थे और फिर टिकट लेकर काफी भीतर जाकर देवी फाल देखा था। गुप्तेश्वर महादेव के लिए हम सडक़ पार करके देवी फाल के विपरित दिशा में गए थे।  लेकिन अब गुफा में नीचे नीचे चलते हुए हम नीचे से सडक़ पार करके फिर से देवी फाल के नजदीक पंहुच गए थे। 

वापस लौटने के लिए सौ सीढियां चढनी थी। बाहर आने तक पसीने से भीग चुके थे। अरुणाचल की हिन्दी अधिकारी गुम्फी जी मेरे पीछे पीछे ही नीचे तक आई थी,जब मैं वापसी में गुप्तेश्वर महादेव पंहुचा,तब मुझे वैदेही नजर आई।  बोली हम तुम्हारा इंतजार कर रहे थे। मैने कहा कि मैं तो नीचे जाकर आ चुका हूं,अब तुम नीचे जाकर देख लो। वैदेही लौटने तक काफी थक चुकी थी। 


अभी साढे पांच हो चुके थे,लेकिन जो भी गुप्तेश्वर जाकर आया था बेहद खुश था। उधर होटल में कार्यक्रम के लिए कुछ साहित्यकारों के आने की बात कही जा रही थी। इसलिए फौरन होटल लौटना था। 


सभी लोग गाडी में सवार हुए और होटल पंहुचे। यहां होटल में आठ-दस लघु कथाकार और साहित्यकार पंहुचे हुए थे। एक दूसरे का स्वागत सम्मान और रचना पाठ का दौर शुरु हो गया,जो करीब दो ढाई घण्टे चला। इसके बाद भोजन की व्यवस्था थी। 


मैं और तुमुल सिन्हा जी एक ही कमरा शेयर कर रहे थे। फिर हमारा चर्चासत्र शुरु हुआ जो करीब पौने बारह बजे तक चला। इसके बाद सोने का मौका मिला और इस तरह पोखरा का यह दिन समाप्त हुआ। कल पोखरा में विन्ध्यवासिनी के दर्शन करते हु ए काठमाण्डू के लिए निकलना है।


नेपाल में घूमने के दौरान कई बातें ध्यान में आई। नेपाल के अधिकांश मुख्य हाईवेज की हालत फिलहाल खस्ता है। यहां होटल दो प्रकार के होते है। भान्छा घर और खाजा घर। भान्छा घर यानी जहां भोजन उपलब्ध होता है,खाजा घर यानी नाश्ता उपलब्ध होता है,भोजन नहीं। शराब हर दुकान पर उपलब्ध है। यहां शराब की अलग दुकानें नहीं है। नेपाल में थकाली भान्छा घर की धूम है। थकाली असल में नेपाल की एक जाति है और थकाली जाति के लोग विशीष्ट प्रकार का भोजन बनाते है,इनकी रैसिपी विशेष प्रकार की होती है,जो यहां काफी पसन्द की जाती है। ठीक वैसे ही जैसे हमारी तरफ सखवाल ब्राम्हणों के बारे में कहा जाता है। नेपाल में थकाली किचन के नाम पर कई नकली थकाली किचन भी चलते हैं। थकाली रैसिपी की बहुत मांग है। हांलाकि थकाली रैसिपी नानवेज में ही अधिक मायने रखती है।


नेपाल में अधिकांश लोग मांसाहारी है,इसलिए कोई भी होटल प्योर वेज नहीं मिलता। कभी कभार कहीं मारवाडी भोजनालय प्योर वेज नजर आ जाते है। नेपाली भाषा में व अक्षर का उच्चारण भ के रुप में किया जाता है,इसलिए यहां वेज को भेज कहा जाता है।


शुध्द शाकाहारी लोगों के लिए खाने के मामले में यहां कई दिक्कतें हैं। नाश्ते के आइटम अत्यन्त सीमित है। नाश्ते में पुरी तरकारी या सब्जी रोटी मिल जाती है। इसके अलावा चाउमिन,थुप्का और मोमो का चलन बहुत ज्यादा है। ये दोनो तरह के होते है वेज भी और नानवेज भी। मोमो को यहां मंमं लिखने है। इसके अलावा नाश्ते में उबले आलू और चने भी खाए जाते हैं। चाय ब्लैक और दूध वाली दोनो तरह की मिलती है। कहीं कहीं समोसा भी नजर आया। सेल रोटी एक नई चीज नजर आई,जो नाश्ते में खाई जाती है। सेल रोटी दो तीन तरह की दाल चावल आदि को मिलाकर गोल रिंग जैसी होती है। इसको तल कर परोसा जाता है। इसमे मिठास भी होती है। वडा सांभर में जिस तरह का वडा होता है,सेल रोटी ठीक वैसी ही लेकिन आकार में बडी होती है। सेल रोटी को ऐसी है जैसी किसी वडे को बडी रिंग के आकार में बना दिया गया हो। सेल रोटी को अकेले या सब्जी के साथ खाया जाता है।


नेपाल एक खासियत ये भी नजर आई कि यहां अंग्रेजी का चलन बहुत कम है। ना तो अंग्रेजी कैलेण्डर का उपयोग होता है और ना ही अंग्रेजी अंकों या संक्षेपाक्षरों का उपयोग किया जाता है। वाहनों की नम्बर प्लेट पर मधेश प्रदेश को एमपी की बजाय मप्र ही लिखा जाता है। वाहन के नम्बर भी देवनागरी लिपि में लिखे जाते है। इतना ही नहीं हम अभी सन 2024 में चल रहे थे,लेकिन नेपाल 2081 में है। यानी यहां विक्रम सम्वत का उपयोग होता है। नेपाल के करेन्सी नोटों पर भी देवनागरी लिपि का ही उपयोग किया जाता है।


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नेपाल यात्रा-4 पोखरा के सारंगकोट का सूर्योदय,जो हम नहीं देख पाए

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15 नवंबर 24 शुक्रवार प्रात: 8.55

होटल सी-लेक पोखरा


आज पोखरा से हमें निकलना है। इस वक्त हम निकलने के लिए तैयार हो रहे हैं। यहां से हम काठमाण्डू जाएंगे,जो कि दो सौ किमी दूर है। वहां पंहुचने में हमे करीब 8 घण्टे लगेंगे। हमें कहा गया है कि सुबह जल्दी निकलना होगा। हम कोशिश कर रहे हैं कि जल्दी तैयार हो जाएं।


15 नवंबर 24 शुक्रवार (रात 11.45)

होटल रामेश्वरम काठमाण्डू (नेपाल)


मैं इस वक्त नेपाल की राजधानी काठमाण्डू में पशुपतिनाथ मन्दिर के बिलकुल नजदीक रामेश्वरम होटल में हूं।


16 नवंबर 24 शनिवार सुबह 6.00

होटल रामेश्वरम काठमाण्डू

हमें जल्दी दर्शन करने जाना है,इसलिए मैं जाग चुका हूं और नित्यकर्म से निवृत्त हो चुका हूं। रात को काफी देर हो गई थी,इसलिए डायरी नहीं लिख पाया था। इस वक्त भी ज्यादा समय नहीं है। लेकिन फिलहाल बाथरुम बिजी है और इस खाली वक्त में मैं डायरी लिख रहा हूं।


बात 14 नवंबर की,जब हम पोखरा में थे और सुबह 4.30 बजे उठकर पोखरा का सूर्योदय देखने के लिए निकलने वाले थे। रात को हमसे कहा गया था कि पोखरा का सूर्योदय बडा ही सुन्दर होता है,लेकिन इसके लिए सुबह जल्दी निकलना होगा। मेरा सुबह जल्दी उठने का कोई इरादा नहीं था। लेकिन बहुत ज्यादा दबाव डाला गया। कहा गया कि सिर्फ आधे घण्टे की बात है।


मैने भी सोचा कि चलो एकाध घण्टे के लिए सुबह जल्दी उठ जाता हूं। सुबह सिर्फ मुंह पर पानी के छींटे मारे और चल पडा,बाकी लोगों के साथ सूर्योदय देखने। सनराईज पाइन्ट पर समय रहते पंहुच गए। इसे सारंग कोट कहा जाता है। नेपाल की कई उंची चोटियां यहां से देखी जा सकती हैं। सारंग कोट पंहुच कर गाडी खडी करके काफी उंचाई तक पैदल जाना था। मैं चल पडा। काफी उपर जाकर एक बडा वाच टावर बनाया गया है। सौ डेढ सौ सीढियां चढ कर मैं वाच टावर के उपर भी पंहुच गया। इस वक्त 5.45 हो रहे थे। मैने गूगल पर सनराईज टाइम देखा,तो पता चला कि आज सूर्योदय 6.31 पर होगा। अभी 45 मिनट इंतजार करना था। मौसम काफी ठण्डा हो रहा था। मैं पैरों में स्लीपर और सिर्फ एक शर्ट पहन कर वहां पंहुचा था। ठण्ड महसूस हो रही थी,लेकिन कोई चारा नहीं था। ठण्ड के साथ में सूर्योदय का इंतजार करता रहा। लेकिन अचानक से आसमान पर बादलों ने कब्जा जमा लिया। सूर्यदेव को बादलों ने ढंक दिया। सूर्योदय का समय भी हो गया। लेकिन आसमान में सिर्फ बादल थे,सूरज नदारद था। हम वापस लौटने को हुए। मुझे लगा था कि अब हम सीधे होटल जाएंगे। गाडी में बैठने पर पता लगा कि हमारी नेपाली होस्ट उषा जी के किसी रिश्तेदार के घर पर ही नाश्ते की व्यवस्था है। पहले वहां जाएंगे,नाश्ता करेंगे और तब होटल लौटेंगे।


मैने तो मुंह भी नहीं धोया था। करीब तीन घण्टे रिश्तेदारी का मिलन चला। मैं भीतर भी नहीं गया। गाडी में ही सोता रहा। मेरा मूड और पेट दोनो खराब हो रहे थे। मैं बिना फ्रैश हुए चला गया था। लेकिन मेरे पास इंतजार करने के अलावा और कोई चारा नहीं था। ना तो सूर्योदय देखने को मिला और उपर से सुबह भी खराब हो गई। खैर दस बजे हम होटल पर वापस लौटे। वापस लौट कर तैयार होते होते ग्यारह बज गए। आज का दिन पोखना घूमना था।  पोखरा भ्रमण की शुरुआत तो सुबह ही हो गई थी.......


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नेपाल यात्रा-3 नेपाली साहित्यकारों से पहली मुलाकात और चितवन नेशनल पार्क में शेरों के दीदार

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13 नवंबर 24 बुधवार

सुबह आठ बजे होटल के नीचे एक छोटे हाल में साहित्य संगम का कार्यक्रम शुरु हो गया। मैं साढे आठ पर तैयार होकर नीचे पंहुचा। रीता जी पूर्वोत्तर हिन्दी साहित्य अकादमी नामक संस्था असम के तेजपुर में चलाती है। सारी योजना उन्ही की थी। चितवन के एक डेढ दर्जन साहित्यकार इस कार्यक्रम में मौजूद थे। स्वागत सत्कार के बाद भारत से गए हम छ: लोगों में से मुझे छोडकर सभी ने अपनी रचनाएं सुनाई। इसके बाद नेपाली साहित्यकारों ने अपनी रचनाएं सुनाई। करीब दो घण्टे यह आयोजन चला। नेपाल के कई साहित्यकार हिन्दी में भी लिखते हैं। हमें भी कई पुस्तकें और प्रमाणपत्र भेंट किए गए।


कार्यक्रम के बाद अल्पाहार किया,मैने तो मटर की सब्जी और रोटी का भोजन ही कर लिया। 


आज हमें चितवन घूम कर शाम तक पोखरा पंहुचना है। चितवन में चितवन नेशनल पार्क है,जहां शेर,चीते गैण्डे जैसे वन्यप्राणी विद्यमान है। मैने सुझाव दिया कि नेशनल पार्क में जाने का कोई मतलब नहीं है,क्योकि दोपहर हो चुकी है और दोपहर को वन्य प्राणी विचरण नहीं करते। लेकिन फिर भी उषा तिवारी जी हमें लेकर पहले चितवन नेशनल पार्क के मुख्यद्वार पर लेकर गई। यहां कुछ फोटो विडीयो बनाकर हम लोग बीस हजारी ताल के गेट पर पंहुचे। यहां पर्यटकों की सुविधा के लिए एक-दो शेरों को पिंजरों में रखा गया है,ताकि पर्यटक शेरों का दीदार कर सके।


हम वहां पंहुचे। शेर को देखने के लिए टावर बनाया गया है। टावर के सामने शेर को रखने का स्थान बनाया गया है। वाच टावर पर चढकर हमने शेरों का दीदार किया। विडीयो बनाए। यहां पर सफेद शेर भी मौजूद था,जो कि दुर्लभ श्रेणी का प्राणी है।


अब यहां से आगे बढे। यहां दो नदियों त्रिशूरी और गण्डकी का संगम है,जिसे देवघाट कहा जाता है। इसे आदि प्रयाग भी कहते है। देवघाट पोखरा के रास्ते में ही पडता है। देवघाट को देखते हुए हम पोखरा के लिए बढ गए। पोखरा की दूरी मात्र 130 किमी थी। लेकिन बताया गया था कि सडक़ खराब है और काफी समय लग सकता है। देवघाट से आगे बढे,तो शुरुआत में सडक़ बढिया थी। तेज गति से गाडी चली। हम करीब ढाई बजे चितवन से पोखरा के लिए निकल गए थे।


रास्ता कहीं बेहद अच्छा था,तो कहीं बेहद खराब। कहीं चौडीकरण का काम चल रहा था। चितवन से पोखरा वाला यह रास्ता पृथ्वी राजमार्ग था। 


गूगल मैप लगातार दिखा रहा था कि हम साढे सात तक पोखरा पंहुचेंगे। जब पोखरा के नजदीक पंहुचे तो सडक़ और खराब हो गई। मुझे लगा था कि हम थोडा पहले पंहुच जाएंगे,लेकिन खराब रास्ते की वजह से आखिरकार पौने आठ बजे हम पोखरा में अपने होटल सी लैक पर पर पंहुचे।


आज चूंकि समय पर आ गए थे,तुमुल सिन्हा जी और मुझे एक ही कमरे में रहना था,इसलिए हमने शाम बहुत अच्छे से गुजारी। शाम को हमें बताया गया कि यहा का सनराइज बडा खुबसूरत होता है,लेकिन उसके लिए सुबह पांच बजे निकलना पडेगा। मैने साफ इंकार कर दिया। मुझे अपनी नींद खराब करके सूर्योदय नहीं देखना था। लेकिन रात के चर्चासत्र में सिन्हा जी ने मुझे चढा दिया। उन्होने कहा चलना ही पडेगा। मैने भी सोचा कि अगर एकाध घण्टे की बात है तो सुबह बिना फ्रैश हुए चले जाएंगे और लौट कर आएंगे तो सुबह के सारे कार्यक्रम निपटा लेंगे। सिन्हा जी के दबाव में मैने हां कह दिया।


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नेपाल यात्रा-2 खचाखच भरी गाडी और नेपाल का उबड खाबड महेन्द्र राजमार्ग

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13 नवंबर 24 बुधवार (रात 8.00 आईएसटी)

होटल सी लेक पोखरा 


दो दिन पहले ट्रेन में डायरी लिख रहा था,तब न्यू जलपाईगुडी नहीं पंहुचे थे। तब से लेकर आज अभी तक डायरी लिखने का मौका ही नहीं मिल पाया। आझ पोखरा पहुच कर अब डायरी लिखने का मौका मिला है। अब पूरे दो दिनों का लम्बी कहानी है,बल्कि तीन दिनों की।


11 नवंबर 

हमारी ट्रेन लेट होते होते आखिरकार 10.30 पर न्यू जलरपाईगुडी स्टेशन पंहुची। कार्यक्रम और यात्रा की होस्ट रीता जी खुद अभी एनजेपी नहीं पंहुच पाई थी। उन्होने बताया कि हमारा होटल सिलीगुडी में है और गुगल मैप के मुताबिक सिलीगुडी एनजेपी स्टेशन से महज  किमी दूर है। हमे होटल स्वस्तिक में जाना था। आटो वाले 6 किमी का छ:सौ मांग रहे थे। फिर एक हाथ रिक्शे वाला आया जो दो सौ रु. में ले जाने को राजी था। मेहनतकश की मदद हो जाएगी यही सोचकर हम उसी के साथ चल पडे। स्टेशन से करीब दो सौ मीटर आगे जाकर हाथ रिक्शा खडे थे। वहां पंहुच कर पता चला कि हमे तय करने वाला व्यक्ति तो दलाल था,वह खुद साइकिल रिक्शा नहीं खींचता था। उसने एक रिक्शे वाले को बुलाया।


वैदेही साइकिल रिक्शा में पहली बार बैठ रही थी।उसे डर भी लग रहा था। लेकिन हम साइकिल रिक्शा में सवार हुए। हमें स्वस्तिक होटल पंहुचने में करीब चालीस मिनट का वक्त लगा। 11.10 पर हम होटल के अपने कमरे में पंहुचे। पंहुचे ही थे कि एक सज्जन आकर हमसे मिले,वे भी हमारी ही तरह इस यात्रा में शामिल होने के लिए भोपाल से आए थे,नाम था तुमुल सिन्हा। प्रारंभिक परिचय हुआ। रीता जी को होटल पंहुचते पंहुचते रात के 12 बज गए थे। उन्होने आते ही बताया कि सुबह पांच बजे यहां से चल देना है। कुल मिलाकर डायरी लिखने का समय नहीं बचा था। जल्दी उठना था इसलिए सुबह साढे चार का अलार्म लगा कर सो गए। 


12 नवंबर मंगलवार

सुबह जल्दी निकलना था,इसलिए साढे चार बजे का अलार्म लगा कर सोए थे। जल्दी उटकर नहा धोकर निकलते निकलते भी साढे पांच बज गए थे,लेकिन मुझे देर नहीं हुई थी।अभी बाकी के लोग भी आ ही रहे थे।


अब मैने देखा कि हमारी यात्रा के लिए एक इनोवा आई थी। इन इनोवा में जाने वालों की संख्या देखकर मुझे थोडा डर लगा। यात्रा की आयोजक रीता सिंह और उनकी छोटी बहन,इसके अलावा अरुणाचल के तेजपुर से आई गुम्फी जी अपने बेटे के साथ,मैं और वैदेही और तुमुल सिन्हा जी और गाडी का ड्राइवर प्रदीप। तो इस तरह अभी कुल 8 लोग हो चुके थे। जब गाडी में बैठने की बात आई तो सबसे पहले मैने बडा दिल दिखाया और सबसे पीछे की सीट पर बैठने को राजी हो गया। मेरे साथ तुमुल सिन्हा जी भी पीछे आ गए।

अब हम बढ चले सिलीगुडी से नेपाल बार्डर काकर भिट्टा के लिए। सिलीगुडी से करीब 40 किमी पर नेपाल की सीमा है। नेपाल की सीमा पर पंहुचते ही वहां के इमिग्रेशन आफिस में पंहुचे। एक व्यक्ति हमारे पास आया,सभी समझे यह कोई सरकारी आदमी होगा। उसने हमे कब्जे में लिया और लेकर चला,सब औपचारिकताएं पूरी करने। पता चला वह एक एजेन्ट है। सबसे पहले वह हमें ले गया करेन्सी एक्सचेंज करने। भारतीय रुपए और नेपाली रुपए में अंतर है। भारत के सौ रुपए नेपाल के 160 रुपए होते है। हमने बारह हजार बदलवाए जो कि बीस हजार से कुछ अधिक हुए। मुद्रा बदल गई। फिर वो दलाल औपचारिकताएं पूरी करने ले गया। रीता सिंह जी जो दुपट्टे नेपाली साहित्यकारों को भेंट करने लाई थी,उस पर उन्हे टेक्स देना पड गया। नेपाली प्रवेश का वास्तविक शुल्क तीन हजार रु. का था,लेकिन दलाल के चक्कर में कुल 8 हजार देना पड गए। 


खैर यहां से आगे बढे। हमारी मंजिल थी चितवन,जो कि करीब 425 किमी दूर था। इस वक्त सुबह के साढे नौ हो चुके थे। यहां से आगे बढे। ये महेन्द्र राजमार्ग था,जिस पर हम चल रहे थे। सडक़ के चौडीकरण का काम चल रहा था। इस वजह से दो तीन किमी चलते ही कोई ना कोई डायवर्शन आजाता था। 

हमें लम्बी दूरी तय करना थी। करीब बारह बजे रास्ते में दमक नामक एक जगह पर रुक कर नाश्ता करना था। यहीं मोबाइल की सिम भी लेना थी। मोबाइल की सिम लेने जहां रुके वहीं नाश्ते की चिन्ता भी कर ली। समय तो भोज नका ही हो रहा था। मैने तो दो आलू पराठे दबा लिए ताकि दिन भर का काम हो जाए। यहां सिम लेने का भी काम पूरा हो गया। नेपाल में एनसेल कम्पनी की सिम चलती है। सभी ने दो सौ रुपए में सात दिन के लिए एनसेल की सिम मोबाइल में लगा ली। दो सौ रुपए में वाइस काल नहीं मिलती,केवल सिमकार्ड और डाटा मिलता है। वाइस काल के लिए 7 दिन का 270 रु. का पैक मिलता है,जो कि मात्र 70 मिनट टाक टाइम सात दिनों के लिए मिलता है। मैने टाक टाइम भी ले लिया। नाश्ते के नाम पर भोजन किया और यहां से आगे बढे। 


अब तक मैं गाडी में पीछे बैठा था,लेकिन मेरे पैरो की हालत खराब हो गई थी। मैने कहा मैं पीछे नहीं बैठ सकता। सीट बहुत नीची है। मैं अगली सीट पर आ गया। यहां से चितवन की दूरी करीब तीन सौ किमी थी और करीब आठ घण्टे का वक्त लगना था। 


जिस रोड पर हम चल रहे थे,वह महेन्द्र राजमार्ग था,जो चितवन होते हुए सीधे काठमाण्डू तक जाता है। करोड के चौडीकरण के कारण जगह जगह डायवर्शन थे और रोड की हालत बेहद खराब थी। चलने की गति बेहद धीमी थी। दोपहर के दो बज चुके थे। मेरे अलावा सभी को भूख लग रही थी,लेकिन रीता जी ने कहा कि भोजन बर्दीबास नामक स्थान पर करेंगे,जो कि अभी करीब सौ किमी दूर था। यानी कम से कम दो घण्टे और लगना थे। बताया गया कि थकाली भोजनालय में बेहतरीन नेपाली खाना मिलता है। थकाली भोजनालय में थकाली शब्द एक जाति विशेष का सूचक है जो नेपाली भोजन को विशेष प्रकार से बनाते है। जैसे हमारे यहां सखवाल ब्राम्हणों को भोजन बनाने में निपुणता हासिल है,उसी तरह नेपाल में थकाली किचन की महिमा है। आखिरकार चार बजते बजते बरदीबास आया और यहां पहली मंजिल पर एक थकाली भोजनालय था,जहां मेरे अलावा सभी ने भोजन किया। 


हमें चितवन से करीब तीस किमी पहले नारायण घाट नामक स्थान पर रुकना था। रास्ते में कुछ स्थानों पर सडक़ की हालत अच्छी भी थी,इसलिए रात करीब साढे नौ बजे हम नारायण घाट के अपने होटल जमघट में पंहुच गए। ये पूरा रास्ता मैदानी इलाके में था,इस पूरे रास्ते में पहाड आदि नहीं थे। 

नारायण घाट पंहुचने पर रीता जी की एक साहित्यकार मित्र ऊषा तिवारी जी ने साहित्य संगम का कार्यक्रम शाम को पांच बजे रखा था,जिसे रद्द करके अब अगले दिन यानी कल सुबह 8 बजे रखा है। सुबह आठ बजे तैयार होना है इसलिए जल्दी उठना होगा।


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यात्रा वृत्तान्त-47 नेपाल यात्रा-भगवान पशुपतिनाथ के दर्शन

 (9 नवंबर 2024 से 20 नवंबर 2024)


11 नवंबर 24 सोमवार  (दोपहर 12.45)

पटना-न्यू बरौनी स्टेशन के बीच

कोच न. बी-1-20 गांधीधाम-कामाख्या एक्सप्रेस

हमारी यह यात्रा शनिवार,रविवार की मध्यरात्रि 3 बजे (तारीख हो चुकी थी 10 नवंबर) रतलाम रेलवे स्टेशन से शुरु हुई। इस यात्रा में मैं और वैदेही भारत और नेपाल के कुछ साहित्यकारों द्वारा आयोजित की गई साहित्यिक यात्रा में भाग लेने के लिए नेपाल जा रहे है। ट्रेन से हम आज रात नौ बजे तक न्यू जलपाईगुडी (प.बंगाल) रेलवे स्टेशन पंहुचेंगे और वहां से फिर सडक़ मार्ग से नेपाल की छ: दिवसीय यात्रा पर निकलेंगे। मेरी यह यात्रा पिछली यात्रा के ठीक 110 दिनों के बाद हो रही है। इस 110 दिनों में काफी कुछ बदल गया है। 


पिछली यात्रा श्रीखण्ड कैलास की थी,जहां से हम 22 जुलाई को लौटे थे। उसके कुछ ही दिनों के बाद आशुतोष के पिताजी रामकृष्ण नवाल जी स्वर्गवासी हो गए। कुछ और दिन गुजरे,17 अगस्त को दादा (पिताजी गोपालराव कोठारी) स्वर्गवासी हो गए। इसके बाद दशहरा दीपावली की व्यस्तता और इसके तुरंत बाद ये यात्रा। 


इस यात्रा की तैयारी सितम्बर अंत से ही शुरु हो गई थी। वैदेही की मित्र रीता सिंह तेजपुर आसाम में कार्यरत है। पूर्वोत्तर हिन्दी साहित्य अकादमी नामक संस्था चलाती है। इसी संस्था के बैनर तले भारत-नेपाल सांस्कृतिक यात्रा और साहित्यकार सम्मेलन का आयोजन नेपाल में हो रहा है। यह आयोजन नेपाल के चितवन,पोखरा और काठमाण्डू में होगा।


रेल के टिकट सितम्बर अंत में करवा लिए थे,लेकिन वेटिंग के टिकट थे। ट्रेन 9 की रात को चलना थी,तो मैने सोचा कि 8 की दोपहर वीआईपी करवा लेंगे। 8 नवंबर की दोपहर डीआरएम आफिस पंहुचा। वहां जाकर पता चला कि इस ट्रेन में रतलाम से वीआईपी कोटा ही नहीं है। फिर डीआरएम आफिस से गांधीधाम मैसेज करवाया। मैसेज करवाने के बाद उम्मीद थी कि रिजर्वेशन कन्फर्म हो जाएगा। 8 की शाम को अचानक मैसेज आया कि 1 बर्थ कन्फर्म हो गई है। मुझे लगा कि ये रुटीन में कन्फर्म हो गई है। अब बची हुई एक बर्थ वीआईपी से कन्फर्म हो जाएगी। लेकिन 9 की दोपहर को पता लगा कि जो एक बर्थ कन्फर्म हुई थी,वह वीआईपी कोटे से ही हुई थी। रतलाम का चार्ट 9 की शाम को बनेगा तब पता चलेगा कि दूसरी बर्थ का क्या हुआ है? लेकिन शाम को जब चार्ज बना तो दूसरी बर्थ वेटिंग में ही रह गई थी। अब बडी चुनौती ये थी कि 42 घण्टों का लम्बा सफर दो लोगों को एक ही बर्थ से पूरा करना था। हमने सोचा,देखते है क्या होता है?


रात को पौने तीन बजे चिन्तन ने हमें कार से स्टेशन पर छोडा। ट्रैन ठीक समय पर आ गई थी। हम अपनी बर्थ पर पंहुचे। सीटों के नीचे सामान जमाया और एक ही बर्थ पर आडे तिरछे होकर पड गए। सुबह करीब साढे छ: बजे सामने की लोअर बर्थ पर सौ रहे सज्जन जाग गए और उन्होने कहा कि मैं उनकी बर्थ पर सो सकता हूं। फिर आराम से 9 बजे तक सोते रहे। इस तरह ट्रेन की पहली रात कट गई। अब चुनौती दूसरी रात गुजारने की थी। हमारे साथ दो सज्जन आरपीएफ के अधिकारी थे,जो किसी जांच के लिए गौहाटी जा रहे थे। उन्होने बताया कि लखनऊ से कुछ सीटें खाली होगी। रात को लखनऊ में टीटी से बात की। 500 का नोट दिया तो उसने सुबह तक के लिए बी-4 में 8 नम्बर बर्थ दे दी। इधर हमारे कम्पार्टमेन्ट में सामने की अपर बर्थ खाली थी। पहले मैं वहीं पर सौ गया। रात साढे बारह पर अयोध्या और सुबह साढे पांच बजे बनारस आना था। रात को सोया तो सुबह बनारस में उस बर्थ के यात्री ने आकर उठाया। फिर मैं उस बर्थ पर चला गया जो टीटी ने मुझे दी थी। सुबह नौ बजे तक मैं आराम से सोया। 


कल ट्रेन राजस्थान से उत्तर प्रदेश में गई थी। कानपुर लखनऊ,अयोध्या,वाराणसी,आदि स्थानों से होते हुए आज ट्रेन ने बिहार में प्रवेश किया। फिलहाल ट्रेन बिहार में चल रही है और हम पटना से न्यू बरौनी,खगरिया,कटिहार होते हुए न्यू जलपाईगुडी पंहुचेंगे। ट्रेन चल रही है। अभी दो घण्टे की देरी से चल रही है। देखते है हम कितने बजे न्यू जलपाईगुडी पंहुचते हैं।


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Saturday, January 11, 2025

श्रीखण्ड महादेव कैलास यात्रा-10/ जहा गुजारी पहली रात वही आखरी रात भी


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21 जुलाई 2024 रविवार (रात 11.45)

प्रिन्स गेस्ट हाउस सवाई माधोपुर (राज.)


इस वक्त हम उसी होटल में रुके हैं जहां यात्रा की पहली रात गुजारी थी। कमरे में एसी चल रहा है और कमरा अच्छे से ठण्डा हो चुका है।बाहर बहुत गर्मी  है। हम गर्म माहौल में से ठण्डक में आए हैं। अच्छी फीलींग है।

श्रीखण्ड महादेव कैलास यात्रा-9 /शानदार बुग्याल बागा सहरन की एक रात


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20 जुलाई 2024 शनिवार (रात10.40)

होटल एवलांच कच्ची घाटी शिमला


इस वक्त मैं शिमला के बाहरी इलाके कच्ची घाटी में होटल एवलांच में हूं और सुबह यहां से जल्दी निकलने की इच्छा के साथ इस वक्त डायरी लिख रहा हूं। 





श्रीखण्ड महादेव कैलास यात्रा-8/ 9 किमी की ढलान के बाद बराठी नाले में अद्भुत स्नान


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19 जुलाई शुक्रवार (रात 11.46)

20 जुलाई 24 शनिवार (प्रात: 9.00)

के-2 हाईट्स बागा सहरन


इस वक्त हम जाओ गांव से 14 किमी उपर बागा सहरन नामक स्थान पर सुबह की तैयारियों में जुटे हैं। हम यहां बीती शाम 7.30 पर पंहुचे थे। रात 11.46 पर डायरी लिखने की कोशिश की थी,लेकिन थकान और नींद इतनी ज्यादा थी कि 4 लाइन भी नहीं लिख पाया। इसलिए अब कल का पूरा घटनाक्रम आज लिख रहा हूं।

श्रीखण्ड महादेव कैलास यात्रा-7/ लगातार 19 घंटो की ट्रेकिंग और श्रीखंड कैलास के दिव्य दर्शन


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18 जुलाई 2024 गुरुवार (शाम 5.45)

थाचडू बेस कैम्प.श्रीखण्ड यात्रा मार्ग


हम अब वापसी की यात्रा कर रहे है और इस वक्त भीमद्वार से चल कर थाचडू आ चुके हैं। आज हम 14 किमी चल चुके हैं। 

श्रीखण्ड महादेव कैलास यात्रा-6 श्रीखंड कैलास के लिए आधी रात को ट्रेकिंग


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आठवां दिन


17 जुलाई 2024 बुधवार (सुबह 9.15)

भीमद्वार बैस कैम्प


मैं,आशुतोष और प्रकाशराव हम तीनो इस वक्त भीमद्वार के उसी टेण्ट में मौजूद है,जहां बीती रात हम सोये थे। 

श्रीखण्ड महादेव कैलास यात्रा-5/ ग्लेशियर को पार करके आ गए भीमद्वार


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सातवां दिन

16 जुलाई 2024 मंगलवार (दोपहर 3.00)

भीमद्वार (श्रीखण्ड कैलास यात्रा मार्ग)


इस वक्त भीम द्वार में जबर्दस्त तेज बारिश हो रही है और भाग्यशाली है कि बारिश तेज होने से पहले टेण्ट में आ चुके है। आज की हमारी यात्रा भीमतलाई से सुबह सवा आठ बजे शुरु हुई थी। भीमतलाई से अगली पहाडी के टाप पर हमे कुंशा कैम्प नजर आ रहा था। लेकिन कुंशा तक पंहुचने के लिए हमे सीधे पहाड से नीचे उतरना था।

श्रीखण्ड महादेव कैलास यात्रा-4 / काली टॉप चढ़ कर उतरे और पहुंचे भीम तलाई


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छठा दिन 

15 जुलाई 2024 सोमवार (अपरान्ह 3.00)

भीम तलाई (अपर)


इस वक्त हम अपर भीमतलाई में एक टेण्ट लेकर रुक गए है। हमने आज सुबह 7.50 पर थाटीविल से चलना प्रारंभ किया था।

श्रीखण्ड महादेव कैलास यात्रा-3 - 12 घंटो में 12 किमी की खड़ी चढ़ाई


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पांचवा दिन 

14 जुलाई 2024 रविवार (शाम 6.50)

थाटीविल (श्रीखण्ड कैलास यात्रा मार्ग)


इस वक्त हम थाटी विल की एक दुकान में रात्रि विश्राम के लिए रुके हुए हैं। आज हम सुबह साढे छ: बजे से 12 घण्टे लगातार चल कर कुल 12 किमी की दूरी तय करके यहां पंहुचे है।

श्रीखण्ड महादेव कैलास यात्रा-2 पहाड़ो के बीच गाड़ी का सफर

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12 जुलाई 2024  शुक्रवार (रात 10.45)

बुशहर सदन रामपुर बुशहर (हिप्र)


इस वक्त हम रामपुर बुशहर के इस सरकारी होटल या यूं कहे कि रेस्ट हाउस में है। हम यहां 7.45 पर पंहुच गए थे। बिना मशक्कत के बुशहर सदन मिल गया और यहां तीसरी मंजिल के दो कमरों में हम टिक गए। हम रतलाम से अब तक 1250 किमी दूर आ चुके है। 

यात्रा वृत्तान्त-46 श्रीखण्ड महादेव कैलास यात्रा


(10 जुलाई 24 से 22 जुलाई 24 तक)

शुरूआती सफर 

10 जुलाई 2021 बुधवार (रात 11.30)

प्रिन्स गेस्ट हाउस (सवाई माधोपुर राज.)


हमारी ये यात्रा प्रारंभ हो चुकी है। इस बार लक्ष्य है श्रीखण्ड महादेव का दर्शन करना। इस वक्त हम सवाई माधोपुर से कुछ ही दूर यहां प्रिन्स गेस्ट हाउस में रुके है। एटलेन एक्सप्रेस वे ठीक सामने है,कल सुबह इसी एटलेन से दिल्ली और आगे का सफर करेंगे।

Saturday, September 21, 2024

अयोध्या-3 /रामलला की अद्भुत श्रृंगार आरती


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 12 मार्च 2024 मंगलवार (रात्रि 9.45) 

साबरमती एक्सप्रेस कोच न. ए-2-43  

अयोध्या की यात्रा अब समाप्ति पर है। हम रतलाम लौट रहे हैं और इस वक्त साबरमती एक्सप्रेस रतलाम की ओर दौड रही है।  

आज की शुरुआत बेहद खास रही।ये दिन बडा खास रहा और इसकी जानकारी कल रात ही मिल गई थी। कारसेवक पुरम में कल सुबह गए थे। वहां कई लोगों से परिचय हुआ था। रात को कारसेवक पुरम से अभिनव नामक युवक का फोन रोचन के पास आया कि क्या आप लोग सुबह आरती में शामिल होना चाहते है? अन्धा क्या चाहे? दो आंखे। कौन इंकार कर सकता था। उन्होने सभी के आधार साफ्ट कापी में मंगवाए और रोचन से कहा कि आपलोग सुबह पांच बजे मन्दिर के मुख्य द्वार पर पंहुच जाएं।   

अयोध्या-2 /राम मन्दिर के लिए रामशिला की भेंट और नन्दीग्राम का भ्रमण

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  11 मार्च 2024 सोमवार,रात 9.15 

जानकी महल अयोध्या धाम  

आज के व्यस्ततम दिन का समापन होने को है। मैं डायरी के साथ हूं और बाकी लोग भोजन कर रहे हैं।

 कल हमें बताया गया था कि तीर्थ क्षेत्र न्यास के महासचिव चंपतराय जी सुबह 8 और 8.30 के बीच मिल सकते है। उन्हे राम शिला भेंट करना थी,इसलिए सुबह 8 बजे यहां से निकलने का इरादा था।  लेकिन प्रतिमा ताई,रोचन,वैदेही और नलू आत्या सुबह 6 बजे मन्दिर के पट खुलते ही रामलला का फिर से दर्शन करना चाहते थे। इसलिए ये चारो सुबह पौने छ: बजे दर्शन करने के लिए रवाना हो गईं। उम्मीद थी कि ये लोग आठ बजे के पहले लौट आएंगी। लेकिन मन्दिर के पट 6 बजे नहीं बल्कि सात बजे खुलते है,इसलिए ये सभी साढे आठ बजे दर्शन करके वापस लौटी।

यात्रा वृत्तान्त-45/ प्राणप्रतिष्ठा के बाद अयोध्या यात्रा (8 मार्च 2024 से 13 मार्च 2024)


 भव्य जन्मभूमि मन्दिर में रामलला की आरती 


 9 मार्च 24 शनिवार (रात 10.45) 

जानकी महल नया घाट अयोध्या धाम  


अयोध्या की पिछली यात्रा 21 दिसम्बर 23 को रतलाम से शुरु हुई थी और 24 दिसम्बर को हम अयोध्या पंहुच गए थे। 26 दिसम्बर को सुबह करीब नौ बजे अयोध्या से वापसी के लिए निकल गए थे। इस हिसाब से अयोध्या की  पिछली यात्रा के ठीक 73 दिन बाद मैं फिर से अयोध्या आ चुका हूं।  अयोध्या की ये यात्रा पूरी तरह पारिवारिक है। सौ.आई और दादा को श्री राम लला के दर्शन करवाने के लिए ये यात्रा की जा रही है। इस यात्रा में मेरे अलावा,वैदेही,चिन्तन,प्रतिमा ताई,रोचन,नलू आत्या,नारायण और आरती वहिनी इस तरह हम कुल दस लोग अयोध्या पंहुचे है।

नेपाल यात्रा-7 पशुपतिनाथ के दर्शनों के साथ नेपाल से वापसी

 प्रारंभ से पढने के लिए यहां क्लिक करें 16 नवंबर 2024 विश्व विख्यात पशुपतिनाथ मन्दिर होटल के बिलकुल सामने ही था। सुबह सवेरे जल्दी उठकर स्नान...