प्रारंभ से पढने के लिए यहां क्लिक करें
13 नवंबर 24 बुधवार (रात 8.00 आईएसटी)
होटल सी लेक पोखरा
दो दिन पहले ट्रेन में डायरी लिख रहा था,तब न्यू जलपाईगुडी नहीं पंहुचे थे। तब से लेकर आज अभी तक डायरी लिखने का मौका ही नहीं मिल पाया। आझ पोखरा पहुच कर अब डायरी लिखने का मौका मिला है। अब पूरे दो दिनों का लम्बी कहानी है,बल्कि तीन दिनों की।
11 नवंबर
हमारी ट्रेन लेट होते होते आखिरकार 10.30 पर न्यू जलरपाईगुडी स्टेशन पंहुची। कार्यक्रम और यात्रा की होस्ट रीता जी खुद अभी एनजेपी नहीं पंहुच पाई थी। उन्होने बताया कि हमारा होटल सिलीगुडी में है और गुगल मैप के मुताबिक सिलीगुडी एनजेपी स्टेशन से महज किमी दूर है। हमे होटल स्वस्तिक में जाना था। आटो वाले 6 किमी का छ:सौ मांग रहे थे। फिर एक हाथ रिक्शे वाला आया जो दो सौ रु. में ले जाने को राजी था। मेहनतकश की मदद हो जाएगी यही सोचकर हम उसी के साथ चल पडे। स्टेशन से करीब दो सौ मीटर आगे जाकर हाथ रिक्शा खडे थे। वहां पंहुच कर पता चला कि हमे तय करने वाला व्यक्ति तो दलाल था,वह खुद साइकिल रिक्शा नहीं खींचता था। उसने एक रिक्शे वाले को बुलाया।
वैदेही साइकिल रिक्शा में पहली बार बैठ रही थी।उसे डर भी लग रहा था। लेकिन हम साइकिल रिक्शा में सवार हुए। हमें स्वस्तिक होटल पंहुचने में करीब चालीस मिनट का वक्त लगा। 11.10 पर हम होटल के अपने कमरे में पंहुचे। पंहुचे ही थे कि एक सज्जन आकर हमसे मिले,वे भी हमारी ही तरह इस यात्रा में शामिल होने के लिए भोपाल से आए थे,नाम था तुमुल सिन्हा। प्रारंभिक परिचय हुआ। रीता जी को होटल पंहुचते पंहुचते रात के 12 बज गए थे। उन्होने आते ही बताया कि सुबह पांच बजे यहां से चल देना है। कुल मिलाकर डायरी लिखने का समय नहीं बचा था। जल्दी उठना था इसलिए सुबह साढे चार का अलार्म लगा कर सो गए।
12 नवंबर मंगलवार
सुबह जल्दी निकलना था,इसलिए साढे चार बजे का अलार्म लगा कर सोए थे। जल्दी उटकर नहा धोकर निकलते निकलते भी साढे पांच बज गए थे,लेकिन मुझे देर नहीं हुई थी।अभी बाकी के लोग भी आ ही रहे थे।
अब मैने देखा कि हमारी यात्रा के लिए एक इनोवा आई थी। इन इनोवा में जाने वालों की संख्या देखकर मुझे थोडा डर लगा। यात्रा की आयोजक रीता सिंह और उनकी छोटी बहन,इसके अलावा अरुणाचल के तेजपुर से आई गुम्फी जी अपने बेटे के साथ,मैं और वैदेही और तुमुल सिन्हा जी और गाडी का ड्राइवर प्रदीप। तो इस तरह अभी कुल 8 लोग हो चुके थे। जब गाडी में बैठने की बात आई तो सबसे पहले मैने बडा दिल दिखाया और सबसे पीछे की सीट पर बैठने को राजी हो गया। मेरे साथ तुमुल सिन्हा जी भी पीछे आ गए।
अब हम बढ चले सिलीगुडी से नेपाल बार्डर काकर भिट्टा के लिए। सिलीगुडी से करीब 40 किमी पर नेपाल की सीमा है। नेपाल की सीमा पर पंहुचते ही वहां के इमिग्रेशन आफिस में पंहुचे। एक व्यक्ति हमारे पास आया,सभी समझे यह कोई सरकारी आदमी होगा। उसने हमे कब्जे में लिया और लेकर चला,सब औपचारिकताएं पूरी करने। पता चला वह एक एजेन्ट है। सबसे पहले वह हमें ले गया करेन्सी एक्सचेंज करने। भारतीय रुपए और नेपाली रुपए में अंतर है। भारत के सौ रुपए नेपाल के 160 रुपए होते है। हमने बारह हजार बदलवाए जो कि बीस हजार से कुछ अधिक हुए। मुद्रा बदल गई। फिर वो दलाल औपचारिकताएं पूरी करने ले गया। रीता सिंह जी जो दुपट्टे नेपाली साहित्यकारों को भेंट करने लाई थी,उस पर उन्हे टेक्स देना पड गया। नेपाली प्रवेश का वास्तविक शुल्क तीन हजार रु. का था,लेकिन दलाल के चक्कर में कुल 8 हजार देना पड गए।
खैर यहां से आगे बढे। हमारी मंजिल थी चितवन,जो कि करीब 425 किमी दूर था। इस वक्त सुबह के साढे नौ हो चुके थे। यहां से आगे बढे। ये महेन्द्र राजमार्ग था,जिस पर हम चल रहे थे। सडक़ के चौडीकरण का काम चल रहा था। इस वजह से दो तीन किमी चलते ही कोई ना कोई डायवर्शन आजाता था।
हमें लम्बी दूरी तय करना थी। करीब बारह बजे रास्ते में दमक नामक एक जगह पर रुक कर नाश्ता करना था। यहीं मोबाइल की सिम भी लेना थी। मोबाइल की सिम लेने जहां रुके वहीं नाश्ते की चिन्ता भी कर ली। समय तो भोज नका ही हो रहा था। मैने तो दो आलू पराठे दबा लिए ताकि दिन भर का काम हो जाए। यहां सिम लेने का भी काम पूरा हो गया। नेपाल में एनसेल कम्पनी की सिम चलती है। सभी ने दो सौ रुपए में सात दिन के लिए एनसेल की सिम मोबाइल में लगा ली। दो सौ रुपए में वाइस काल नहीं मिलती,केवल सिमकार्ड और डाटा मिलता है। वाइस काल के लिए 7 दिन का 270 रु. का पैक मिलता है,जो कि मात्र 70 मिनट टाक टाइम सात दिनों के लिए मिलता है। मैने टाक टाइम भी ले लिया। नाश्ते के नाम पर भोजन किया और यहां से आगे बढे।
अब तक मैं गाडी में पीछे बैठा था,लेकिन मेरे पैरो की हालत खराब हो गई थी। मैने कहा मैं पीछे नहीं बैठ सकता। सीट बहुत नीची है। मैं अगली सीट पर आ गया। यहां से चितवन की दूरी करीब तीन सौ किमी थी और करीब आठ घण्टे का वक्त लगना था।
जिस रोड पर हम चल रहे थे,वह महेन्द्र राजमार्ग था,जो चितवन होते हुए सीधे काठमाण्डू तक जाता है। करोड के चौडीकरण के कारण जगह जगह डायवर्शन थे और रोड की हालत बेहद खराब थी। चलने की गति बेहद धीमी थी। दोपहर के दो बज चुके थे। मेरे अलावा सभी को भूख लग रही थी,लेकिन रीता जी ने कहा कि भोजन बर्दीबास नामक स्थान पर करेंगे,जो कि अभी करीब सौ किमी दूर था। यानी कम से कम दो घण्टे और लगना थे। बताया गया कि थकाली भोजनालय में बेहतरीन नेपाली खाना मिलता है। थकाली भोजनालय में थकाली शब्द एक जाति विशेष का सूचक है जो नेपाली भोजन को विशेष प्रकार से बनाते है। जैसे हमारे यहां सखवाल ब्राम्हणों को भोजन बनाने में निपुणता हासिल है,उसी तरह नेपाल में थकाली किचन की महिमा है। आखिरकार चार बजते बजते बरदीबास आया और यहां पहली मंजिल पर एक थकाली भोजनालय था,जहां मेरे अलावा सभी ने भोजन किया।
हमें चितवन से करीब तीस किमी पहले नारायण घाट नामक स्थान पर रुकना था। रास्ते में कुछ स्थानों पर सडक़ की हालत अच्छी भी थी,इसलिए रात करीब साढे नौ बजे हम नारायण घाट के अपने होटल जमघट में पंहुच गए। ये पूरा रास्ता मैदानी इलाके में था,इस पूरे रास्ते में पहाड आदि नहीं थे।
नारायण घाट पंहुचने पर रीता जी की एक साहित्यकार मित्र ऊषा तिवारी जी ने साहित्य संगम का कार्यक्रम शाम को पांच बजे रखा था,जिसे रद्द करके अब अगले दिन यानी कल सुबह 8 बजे रखा है। सुबह आठ बजे तैयार होना है इसलिए जल्दी उठना होगा।
अगला भाग पढने के लिए यहां क्लिक करें

