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18 नवंबर 24 सोमवार (रात 8.00 बजे)
गौहाटी ओखा द्वारका एक्सप्रेस (कोच बी-
2-17,18
हमारी ट्रेन अब हमारे घर की दिशा में तेजी से दौड रही है और 20 नवंबर की सुबह हम रतलाम में होंगे। पूरे सफर में ट्रेन के डिब्बे में ही सबसे ज्यादा खाली वक्त मिल रहा है। शायद ये ऐसी पहली यात्रा थी,जिसमें डायरी बहुत कम लिख पाया। बेहद अस्तव्यस्त यात्रा के चलते डायरी लिखने के लिए पर्याप्त समय ही नहीं मिल पाया। इसलिए अब ट्रेन में चलने के दौरान ही सबकुछ लिखना है।
14 नवंबर 24
जिस समय डायरी छूटी थी,उस वक्त में पोखरा भ्रमण की कथा कह रहा था। सूर्योदय देखने की असफल कोशिश और बेवजह तीन घण्टे खराब होने के बाद हम करीब दस बजे होटल वापस लौटे थे। हमारी होस्ट रीता जी और ऊषा जी ने कहा कि हमे बहुत जल्दी निकलना होगा,तभी हम पोखरा घूम सकेंगे।
लेकिन मैं और तुमुल सिन्हा जी वैसे ही भडके हुए थे,इसलिए हमने कहा कि नहाने धोने में जितना समय लगता है,उतना तो लगेगा ही। हमें तैयार होने में करीब डेढ घण्टा लगा और हम साढे ग्यारह बजे पोखरा घूमने निकल पाए।
पोखरा में हमारे होटल का नाम सी लेक था। पोखरा में फेवा झील बहुत प्रसिध्द झील है और हमारा होटल झील के बिलकुल नजदीक था,इसलिए होटल का नाम सी लेक था। फेवा लेक पहाडों के बीच बनी हुई बेहद विशाल झील है। फेवा झील करीब 4 किमी लम्बी और करीब 9 किमी चौडी झील है। फेवा झील को पहले बैदाम ताल कहा जाता था। यह झील पोखरा घाटी के दक्षिण में स्थित है और इसमे पोखरा शहर,सारंगकोट और कास्किकोट के कुछ हिस्से शामिल है। यह नेपाल की रारा झील के बाद दूसरी और नेपाल के गण्डकी प्रान्त की सबसे बडी झील है। झील के बीचोबीच में एक छोटे से टापू पर ताल बाराही मन्दिर है,जहां सिर्फ बोट से ही जाया जा सकता है।
चूंकि होटल के सबसे नजदीक फेवा झील थी,इसलिए पोखरा भ्रमण की शुरुआत यहीं से की गई। हम करीब साढे ग्यारह बजे फेवा झील पर पंहुचे। यहां आने वाले पर्यटक बोटिंग का आनन्द लेते है। पैडल बोट भी यहां बडी संख्या में हैं। लेकिन हममे से कोई भी बोटिंग करने का इच्छुक नहीं था,बल्कि बोट से ताल बाराही मन्दिर के दर्शन जरुर सभी करना चाहते थे। बोट से ताल बाराही मन्दिर जाने के लिए सभी यात्रियों को लाइफ जैकेट पहनना होती है। लाइफ जैकेट पहन कर सभी एक बोट में सवार हुए और ताल बाराही मन्दिर के टापू पर जा पंहुचे। इसछोटे से टापू पर शिव जी का मन्दिर है। गणेश जी और हनुमान जी भी यहां स्थापित है। टापू पर पंहुचकर मैने इसका विडीयो बनाया। हमें बताया गया कि इस टापू पर एक बूढी महिला रहती थी। एक रात बहुत तेज बारिश हुई और इस बारिश के दौरान एक महिला बूढी महिला के पास पंहुची और रात गुजारने का आश्रय मांगा। बूढी महिला ने उसे अपनी झोपडी में रात गुजारने के लिए जगह दे दी। वह ताल बाराही देवी थी। उसने बूढी महिला को वरदान दिया कि इस बारिश से आसपास सब कुछ डूब जाएगा,लेकिन ये झोपडी नहीं डूबेगी। तभी से इसके चारो ओर पानी है,लेकिन यह टापू बीच में मौजूद थे। ताल बाराही टापू पर मन्दिरों के दर्शन करके हम वापस किनारे पर लौटे।
होटल से निकलते वक्त मैने कुछ भी खाया पिया नहीं था। मुझे उम्मीद थी कि जहां जाएंगे वहां कुछ ना कुछ खाने को मिल ही जाएगा। लेकिन झील के किनारे पर खाने के लिए कुछ नहीं मिला। भूख से मेरी हालत खराब होने लगी थी। लेकिन झील से निकल कर चितवन वाली ऊषा जी हमें महेन्द्र गुफा ले गई। महेन्द्र गुफा के बाहर भी कुछ भी खाने पीने को नहीं मिला।
महेन्द्र गुफा जमीन से काफी नीचे एक बहुत विशाल गुफा है,जिसका नाम नेपाल के महाराजा महेन्द्र के नाम पर रखा गया है। नीचे उतरने के बाद गुफा में जब आगे बढते हैं,तो करीब सौ मीटर चलने के बाद दोराहा आ जाता है। बाई ओर का रास्ता अंधेरा है और इसे बन्द किया हुआ है और इसे बेट केव यानी चमगादडों की गुफा कहतै है। कहते हैं कि ये काफी भीतर तक गई है और इसमें आमतौर पर कोई नहीं जाता। लेकिन इसके विपरित दाहिनी ओर आगे बढते हैं,तो गुफा का रास्ता आगे बढते हुए शिवजी के मन्दिर पर जाकर समाप्त होता है।
यहां शिवलिंग और गणेश जी की प्राकृतिक रुप से बनी हुई मूर्तियां विराजित है। यहां एक पण्डित जी भी विराजित थे। इसी स्थान पर पवित्र जल का चमत्कारिक कुण्ड भी है,जिसका पानी कभी समाप्त नहीं होता। मैने गुफा का विडीयो बनाया। पाण्डित जी का इंटरव्यू भी लिया। पण्डित जी ने बताया कि गुफा या तो पानी से बनती है या फिर ज्वालामुखी से। यह गुफा ज्वालामुखी से बनी हुई है। उन्होने कुण्ड का चमत्कारिक जल हम लोगों पर छिडका और चरणामृत की तरह हाथों पर भी दिया। महादेव और गणेश जी के दर्शन कर हम गुफा से बाहर निकले।
घडी अब एक बजे का वक्त दिखा रही थी और मैने सुबह से कुछ भी नहीं खाया था। भूख से मेरी हालत खराब हो रही थी।पोखरा में ऊषा जी के एक रिश्तेदार का रेस्टोरेन्ट था,उन्होने वहीं सभी के नाश्ते की व्यवस्था की थी। हम करीब एक बजे उस होटल में पंहुचे। यहां आलू पराठे बनाए गए थे। मैने तो इसी से अपना भोजन कर लिया। अब दोपहर के सवा दो बज गए थे।
रीता जी और ऊषा जी ने बताया कि पोखरा का साहित्यिक कार्यक्रम शाम को पांच बजे हैं,इसलिए अब घूमने के लिए हमारे पास मात्र तीन घण्टे है। इसलिए उन्होने हमें देवी फाल दिखाने का प्रस्ताव रखा। हममे से कोई भी पोखरा के बारे में कुछ जानता नहीं था। हमें क्या पता,कहां जाना है? क्या देखना है?,देवी फाल तो देवी फाल ही सही। देवी फाल पंहुचे,यहां के टिकट लिए और भीतर गए तब तक चार बज चुके थे।
देवी फाल में नदी का पानी बेहद तेज बहाव से गिरता है। हांलाकि झरना ज्यादा उंचाई से नहीं गिरता,लेकिन पानी का बहाव इतना तेज है कि यहां पानी की बूंदे भाप बनकर या धुएं की शक्ल में उडती है। बेहद तेज बहाव में बहता यह पानी थोडा ही आगे जाकर लुप्त हो जाता है। यहां के विडीयो बनाए। इसी दौरान यहां के बोर्ड पर देखा कि गुप्तेश्वर महादेव यहां से मात्र सौ मीटर की दूरी पर है। जो कि एशिया की सबसे प्राचीन और सबसे विशाल गुफा में विराजित है। मैने रीता जी और ऊषा जी को गुप्तेश्वर देखने का प्रस्ताव दिया तो उन्होने कार्यक्रम शुरु होने का हवाला दिया। लेकिन जब मैने उन्हे बताया कि यब बिलकुल नजदीक ही है,तो सब लोग वहां जाने को राजी हो गए।
पूरी नेपाल यात्रा में सबसे शानदार और जबर्दस्त स्थान यही था। नेपाल सरकार ने इस गुफा के प्रवेश को अत्यन्त सुन्दर बनाया है। टिकट लेने के बाद गुफा के द्वार तक पंहुचने के लिए नीचे उतरती गोलाकार सीढियां बनाई गई है और इसकी दीवार पर देवी देवताओं की सुन्दर मूर्तियां तथा पौराणिक कथाओं जैसे समुद्र मंथन के दृश्यों वाली मूर्तियां लगाई गई हैं। नीचे उतरकर गुफा के द्वार पर पंहुचने के बाद जब गुफा में नीचे उतरते हैं तो सीढियां बनी हुई हैं,जो हमें करीब 50 फीट नीचे ले जाती है। यहां गुप्तेश्वर महादेव का मन्दिर है जो गोलाकार बना हुआ है। यहां कैमरे की मनाही थी,लेकिन मैने जैसे तैसे विडीयो बना ही लिया।
लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती,बल्कि यहां से शुरु होती है। महादेव के मन्दिर से आगे बढते हैं,तो थोडा नीचे उतरकर गुफा का रास्ता शुरु होता है,जो थोडा संकरा है,लेकिन एक व्यक्ति आराम से चल सकता है। गुफा का टेढा मेढा रास्ता करीब 500-700 मीटर लम्बा है और यह एख बेहद विशाल गुफा में पंहुचता है। बहुत ही विशाल गुफा जिसमें हर तरफ पानी टपकता रहता है। गुफा के एक कोने में महादेव और पार्वती माता की आमने सामने बैठी मूर्तियां है। गुफा के भीतर का वातावरण बडा ही डराने वाला है। इसमें हर ओर पानी तो टपक ही रहा है,ठण्ड भी बहुत है साथ ही आक्सिजन भी कम है।
लेकिन चमत्कार इससे भी आगे है। गुफा में पंहुचने पर नीचे पानी का कुण्ड नजर आता है और इस कुण्ड के नजदीक पंहुचने के लिए लोहे की सीढियां लगाई गई है। करीब सौ सीढियां उतरकर जब पानी के कुण्ड के पास पंहुचते है,तो जाकर पता चलता है कि यहां वही पानी आ रहा है,जो देवी फाल में लुप्त हो गया था। इस गुफा के आखरी छोर पर देवी फाल भी नजर आने लगता है। इस पूरी गुफा में भी देवी फाल के पानी का धुआं धुआं भरा हुआ है।
देवी फाल देखने के लिए हम सडक़ के दाहिनी ओर गए थे और फिर टिकट लेकर काफी भीतर जाकर देवी फाल देखा था। गुप्तेश्वर महादेव के लिए हम सडक़ पार करके देवी फाल के विपरित दिशा में गए थे। लेकिन अब गुफा में नीचे नीचे चलते हुए हम नीचे से सडक़ पार करके फिर से देवी फाल के नजदीक पंहुच गए थे।
वापस लौटने के लिए सौ सीढियां चढनी थी। बाहर आने तक पसीने से भीग चुके थे। अरुणाचल की हिन्दी अधिकारी गुम्फी जी मेरे पीछे पीछे ही नीचे तक आई थी,जब मैं वापसी में गुप्तेश्वर महादेव पंहुचा,तब मुझे वैदेही नजर आई। बोली हम तुम्हारा इंतजार कर रहे थे। मैने कहा कि मैं तो नीचे जाकर आ चुका हूं,अब तुम नीचे जाकर देख लो। वैदेही लौटने तक काफी थक चुकी थी।
अभी साढे पांच हो चुके थे,लेकिन जो भी गुप्तेश्वर जाकर आया था बेहद खुश था। उधर होटल में कार्यक्रम के लिए कुछ साहित्यकारों के आने की बात कही जा रही थी। इसलिए फौरन होटल लौटना था।
सभी लोग गाडी में सवार हुए और होटल पंहुचे। यहां होटल में आठ-दस लघु कथाकार और साहित्यकार पंहुचे हुए थे। एक दूसरे का स्वागत सम्मान और रचना पाठ का दौर शुरु हो गया,जो करीब दो ढाई घण्टे चला। इसके बाद भोजन की व्यवस्था थी।
मैं और तुमुल सिन्हा जी एक ही कमरा शेयर कर रहे थे। फिर हमारा चर्चासत्र शुरु हुआ जो करीब पौने बारह बजे तक चला। इसके बाद सोने का मौका मिला और इस तरह पोखरा का यह दिन समाप्त हुआ। कल पोखरा में विन्ध्यवासिनी के दर्शन करते हु ए काठमाण्डू के लिए निकलना है।
नेपाल में घूमने के दौरान कई बातें ध्यान में आई। नेपाल के अधिकांश मुख्य हाईवेज की हालत फिलहाल खस्ता है। यहां होटल दो प्रकार के होते है। भान्छा घर और खाजा घर। भान्छा घर यानी जहां भोजन उपलब्ध होता है,खाजा घर यानी नाश्ता उपलब्ध होता है,भोजन नहीं। शराब हर दुकान पर उपलब्ध है। यहां शराब की अलग दुकानें नहीं है। नेपाल में थकाली भान्छा घर की धूम है। थकाली असल में नेपाल की एक जाति है और थकाली जाति के लोग विशीष्ट प्रकार का भोजन बनाते है,इनकी रैसिपी विशेष प्रकार की होती है,जो यहां काफी पसन्द की जाती है। ठीक वैसे ही जैसे हमारी तरफ सखवाल ब्राम्हणों के बारे में कहा जाता है। नेपाल में थकाली किचन के नाम पर कई नकली थकाली किचन भी चलते हैं। थकाली रैसिपी की बहुत मांग है। हांलाकि थकाली रैसिपी नानवेज में ही अधिक मायने रखती है।
नेपाल में अधिकांश लोग मांसाहारी है,इसलिए कोई भी होटल प्योर वेज नहीं मिलता। कभी कभार कहीं मारवाडी भोजनालय प्योर वेज नजर आ जाते है। नेपाली भाषा में व अक्षर का उच्चारण भ के रुप में किया जाता है,इसलिए यहां वेज को भेज कहा जाता है।
शुध्द शाकाहारी लोगों के लिए खाने के मामले में यहां कई दिक्कतें हैं। नाश्ते के आइटम अत्यन्त सीमित है। नाश्ते में पुरी तरकारी या सब्जी रोटी मिल जाती है। इसके अलावा चाउमिन,थुप्का और मोमो का चलन बहुत ज्यादा है। ये दोनो तरह के होते है वेज भी और नानवेज भी। मोमो को यहां मंमं लिखने है। इसके अलावा नाश्ते में उबले आलू और चने भी खाए जाते हैं। चाय ब्लैक और दूध वाली दोनो तरह की मिलती है। कहीं कहीं समोसा भी नजर आया। सेल रोटी एक नई चीज नजर आई,जो नाश्ते में खाई जाती है। सेल रोटी दो तीन तरह की दाल चावल आदि को मिलाकर गोल रिंग जैसी होती है। इसको तल कर परोसा जाता है। इसमे मिठास भी होती है। वडा सांभर में जिस तरह का वडा होता है,सेल रोटी ठीक वैसी ही लेकिन आकार में बडी होती है। सेल रोटी को ऐसी है जैसी किसी वडे को बडी रिंग के आकार में बना दिया गया हो। सेल रोटी को अकेले या सब्जी के साथ खाया जाता है।
नेपाल एक खासियत ये भी नजर आई कि यहां अंग्रेजी का चलन बहुत कम है। ना तो अंग्रेजी कैलेण्डर का उपयोग होता है और ना ही अंग्रेजी अंकों या संक्षेपाक्षरों का उपयोग किया जाता है। वाहनों की नम्बर प्लेट पर मधेश प्रदेश को एमपी की बजाय मप्र ही लिखा जाता है। वाहन के नम्बर भी देवनागरी लिपि में लिखे जाते है। इतना ही नहीं हम अभी सन 2024 में चल रहे थे,लेकिन नेपाल 2081 में है। यानी यहां विक्रम सम्वत का उपयोग होता है। नेपाल के करेन्सी नोटों पर भी देवनागरी लिपि का ही उपयोग किया जाता है।
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